Oct 12, 2016 · 1 min read

क्युँ नहीं है

हम हार के भी मुस्कुराते है
तू जीत कर खुश क्युँ नहीं है
एहसास है मुझे तेरे गम का
तू मेरे जख्मों से रूबरू क्युँ नहीं है
मेरे हर लब्ज़ में तेरा नाम है
तुझमे मेरी धड़कने क्युँ नहीं है
वक्त चल रहा है तो तू
ठहरा सा क्युँ है
शायद मेरी कुछ साँसे
तुझमे रह गयी है
मेरा ये दिल आज भी
संभलता क्युँ नहीं है

– सोनिका मिश्रा

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