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Apr 1, 2018 · 4 min read

कवि का परिचय( पं बृजेश कुमार नायक का परिचय)

नमन ‘बृजेश कुमार’ का, गुरुवर हो स्वीकार ।
‘नायक’ शुभ उपनाम प्रभु, तुम सुबोध-आधार ।।
तुम सुबोध -आधार, पढाई पढ बहुधंधी ।
पा ली श्रेणी प्रथम, परास्नातक हिंदी
से कर के उत्तीर्ण,कला निष्णातरूप धन
की मिल गई उपाधि, सद्गुरू पुन:शुभ नमन ।।

सहज कहूँ सत् जन्म भू, कैथेरी शुभ ग्राम ।
जनपद प्रिय जालौन है, शिव को सघन प्रणाम ।।
शिव को सघन प्रणाम, राज्य उत्तर प्रदेश प्रभु ।
जगत्- बंधु का रूप, स्वयं भारत स्वदेश विभु ।।
‘नायक’ हे जगदीश!, दिव्य सद्ज्ञानमयी रज
का दो प्रेमाकाश, मैं भी बन जाऊँ सहज ।।

माता औ पितु-चरण में,मेरा सारा ज्ञान ।
जिन सद्कृपा-फुहार से, मिली सूक्ष्म पहचान ।।
मिली सूक्ष्म पहचान, ज्ञानमय शुभाशीष गह ।
वह अति तीक्ष्ण सप्रेम, विज्ञतामय चेतन अह ।।
‘नायक’ सुनो सुजान, प्रीतिमय योग सुप्रात:।
स्वर्ग वास हो गया, हृदय में हैं श्री माता ।।

माता मेरी मूरती, पिता श्री रामस्वरूप ।
आठ मई शुभ जन्मतिथि, गुरूवर लिखी अनूप ।।
गुरुवर लिखी अनूप, वर्ष उन्नीस व इकसठ ।
जीवन दिव्य प्रकाश, बनेगा, गह ज्ञानी घट ।।
‘नायक’ शिक्षा हेतु ,पाठशाला नित जाता |
मिली बोधमय दीप्ति ,हर्षमय पितु औ माता ।।

सज-धज कर हम चल दिए,ग्राम कनासी-ओर ।
इक्यासी सन में हुए, दोनों ही चित-चोर ।।
दोनो ही चित-चोर, शिव कुमारी -सी जाया ।
पाकर हुआ प्रसन्न, साधुता की वह माया ।।
‘नायक’ आज सहर्ष, मातु-पितु-मन बनकर ध्वज।
देख,उढा हे ईश, बहू आई है सज-धज ।।

कैथेरी में मिल गए उर को ईश सु कंथ।
मंदिर पुरखों ने बना, कहा पकड़ प्रभु-पंथ।
कहा पकड़ प्रभु-पंथ पुजारी श्री मुरलीधर
के सुत पूजें पैर ,राम-सिय सह धरणीधर ।।
‘नायक’ जोड़ूँ हाथ, करो ना अब तुम देरी ।
वहीं पास शिवलिंग,पूज लो कह कैथेरी ।।

गुरुमय मंत्र प्रदान कर श्री दैपुरिया आज ।
जी में बैठे आनकर, पूर्ण हुए सब काज ।।
पूर्ण हुए सब काज, गोद में दो सुत खेले ।
गृह-जन हर्षित आज, हृदय आनंद उढेले ।।
‘नायक’ हृदय उदास, शोक-जल पाकर उर-क्षय।
ईश -निकट गुरु गए, दु:ख है लेकिन गुरुमय ।।

कैथेरी तज, कोंच में, भामा गृह-दिक्पाल
से आच्छादित मायका ,में मेरी ससुराल ।।
में मेरी ससुराल, बना, शुभ-सुंदर-लघु घर ।
मैं सह प्रिया-निवास ,यही है क्रौंच-ऋषि-नगर ।।
‘नायक’ सुनो सुजान, हर्षमय जाया मेरी ।
देख समय की चाल, त्याग दी प्रिय कैथेरी ।।

कैथेरी अनुरागमय, कोंच प्रीति-सुख दून |
गली आज मन-फॉस तो, उर बन गया प्रसून ||
उर बन गया प्रसून, बना सद्गुरू -पथ-गामी |
लगा आ रहे निकट, दिव्यतम अंतर्यामी ||
‘नायक’ सचमुच लगी, ज्ञान की अनुपम फेरी |
मिला दिव्य प्रभु-हर्ष,प्रफुल्लित हिय कैथेरी ||

दीक्षित सरजू कनासी भामा जी के पित्र |
गृह-स्वामी बनकर रहें,त्रिया-संग वह अत्र ||
त्रिया-संग वह अत्र, हुए ईश्वर को प्यारे |
रोयी मेरा सास, भाग्य लुट गए हमारे||
‘नायक’ शोक अपार, आज जी में परिलक्षित |
सब घर विकल-उदास,नहीं अब सरजू दीक्षित ||

बन गए अधिकारी-श्री ,बड़-सुत पवन कुमार |
भारतवर्ष महान हित ,नौसेना का सार ||
नौसेना का सार, गृह कर नूतन जीवन |
बन गए अमल विकास, राष्ट्र हित की संजीवन ||
‘नायक’ सचमुच आप, देश-रक्षारूपी जन |
गुणा-दक्ष यश- खान, जीवनी हित पोषक बन ||

रवि सुत मेरे अभी भी,सीख रहे सद्ज्ञान |
शुभाशीष तुमको बनो,दिव्य सजगता -खान||
दिव्य सजगता-खान ,बोध-बिन मात्र अँधेरा |
गह कर अमल सुबोध, पकड़ लो चेत -सवेरा ||
‘नायक’ जागो आप, हृदय बन जाए प्रेम-छवि |
गुणी, दक्षतारूप, सुयश गह चमको बन रवि ||

ए पी ओ पद ग्रहण कर,खिला हृदय का फूल |
राज्य-प्रशिक्षक-प्रवर्तक,पद गह सुख की चूल ||
पद गह सुख की चूल, पंचपरमेश्वर यात्रा
करी खींच द्विचक्र, *निदेशक संग **सु यात्रा ||
‘नायक’ देखो आज, सु प्रेरित उररूपी ओ|
करी सुदर्शन क्रिया, अब नहीं मैं ए पी ओ ||

श्री रविशंकर सद्गुरू, दिव्य प्रेम सह ज्ञान |
बाल चपलता कृष्णमय,सदा खींचती ध्यान ||
सदा खींचती ध्यान, आत्म-आनंद-प्रदाता |
योगमयी सद्भूप, कभी ना खोते आपा ||
‘नायक’ सुनो सुजान, ज्ञानमय सागर श्री जी |
ध्यान-मग्न ऋषिरूप,कहें हम उनको श्री श्री ||

“जीवन जीने की कला “,सीखी सद्गुरू -धाम |
कई साल धोए चरण, हृदयबना सुख-धाम ||
हृदय बना सुख-धाम, मिल गया दिव्य ज्ञान -कण |
करी साधना नित्य, घना हो गया ध्यान -धन ||
‘नायक’ अमल अकाश, प्रेम की शुभ काशी बन |
गह सद्ज्ञानालोक,मुस्कराहटमय जीवन ||

शादी पवन कुमार की, हुई स्वाति के संग |
पुत्रवधू घर आ गई, बनकर पावन गंग ||
बनकर पावन गंग, चार तिथि औ सत्रह सन |
माह दिसम्बर जान, प्रफुल्लित हम सबका मन ||
कह ‘नायक’ कविराय,पढें पंडित शुभ-आदी |
पवन संग हो गयी, स्वाति की पावन शादी ||
…………………………………………………..

*निदेशक =श्री चंद्रशेखर प्राण, कार्यक्रम निदेशक, नेहरु युवा केंद्र संगठन,भारत
**सु यात्रा =सुंदर यात्रा ( कई राज्यों की सुंदर साइकिल यात्रा )
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कोंच नगर , ईसवी सन के पूर्व जन्म लेने वाले महान तपस्वी-संत ऋषिवर क्रौंच की तपोभूमि,तहसील मुख्यालय एवं नगर पालिका परिषद है जो भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश प्रांत के जिला-जालौन में स्थित है |कोंच में रेलवे स्टेशन है जिसका नाम अंग्रेजी शासन के बाद तक ऋषिवर क्रौंच के नाम पर कुंच (kunch) था | बाद में रेल विभाग ने कुंच स्टेशन का नाम परिवर्तित कर कोंच कर दिया |

ऋषिवर क्रौंच सु नाम पर, प्रजा कहे श्री कुंच |
चहुँ दिश वोध-विमान द्विज, ना कोई भी टुंच |
ना कोई भी टुंच, गुरू का पावन साया |
कहे जान सद्धर्म, विश्व है भ्रम की माया ||
……………………….
ऋषिवर क्रौंच सुनाम से विश्व है भ्रम की माया , तक चार पंक्तियाँ “क्रौंच सु ऋषि-आलोक” कृति की कुंडलिया से ली गयीं है | जो यह बतलातीं है कि ऋषिवर ‘क्रौंच’ को आम-जन कुंच नाम से भी जानता,पहचानता,एवं पुकारता था
………….. …… .. …………………….
Pt Brijesh Nayak
(बृजेश कुमार नायक)
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता |

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