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19 Jan 2024 · 1 min read

अजीब मानसिक दौर है

अजीब मानसिक दौर है
अजीब मानसिक दौर है रिश्ते खूब अपने हैं पर कोई सुनने वाला नहीं रिश्ते खूब सजने हैं मगर कोई नहीं जिसको बोल सके बिना सोचे रिश्ते खूब सारे हैं फिर क्यों अकेला है अंदर से इंसान
रिश्ते इतने अपने हैं की समझ नहीं पा रहे अपने अंदर का शोर मेरा रिश्ते इतने दिल के हैं की वक्त बस बहाना रह गया है अपनेपन के रिश्तों में रिश्ते क्यों हैं आस पास इतने जब वजूद खाली है
इन रिश्तों का नियत से उम्मीद की थी संभाल लेंगे रिश्ते पर आज कल इंसान मर रहा है उम्मीदें फितरत से इन रिश्तों में अंदर ही अंदर

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