घर के आंगन पेड़ न दीखा

घर के आंगन पेड़ न दीखा
तब चिड़िया कमरे तक आयी ।
ढूंढ जगह है छत के भीतर
शुरू नीड़ की नींव खुदायी ।
कोना – कोना उड़ती फिरती
राजू के है मन को भायी ।
पूछा उससे जो मैंने तो
कुछ ऐसे है बात सुनायी ।
चीं-चीं सुर में वह है बोली
तुम बताओ कहाँ मैं जाऊँ ?
पेड़ नहीं जब आस-पास है
किस डाली पर नीड़ बनाऊँ ।
दाना तुमने जो है डाला
उसको ही मैं चुग-चुग खाऊँ ।
नज़र न आते चमन कहीं भी
नन्हें चूजे कहाँ बिठाऊँ ?
डॉ. रीता सिंह
चन्दौसी संभल