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3 Apr 2024 01:53 AM

!! अभिलाषा !!
शैशव आकुल है उड़ने को चेतक तुरंग की चाल।
आनंदमयी अठखेलियों संग ले कटार औ ढाल ।।
ओज शक्ति साहस समाया,लगे तुम्हें सपना सा।
हुंकार भरूं दुर्जन दुष्टों,संहार करूं वीरांगना सा।।

हाथी घोड़ा ढाल कटारी,अतिशय प्यारे लगते हैं।
वीरों की सुनकर गाथाएं,दम सामर्थ्य का भरते हैं।।
नहीं चाहिए गुड्डा-गुडियां,खेल खिलौने माटी को।
अबला नहीं कहलाएंगे,तोड़ दिया परिपाटी को।।

तुलजा वीर भवानी माता देना मुझको आशीष।
साकार कल्पना हो ,चरणों में गद्दारों के शीश।।
कोमल हृदय करें कल्पना, वीरांगना कहलाऊं।
कोमल कली समझ नहीं,लक्ष्मीबाई बन जाऊं।।

जीवन में नवकिरणें उल्लास सर्वत्र आलोकित हो।
चंदन कुंदन हो जाए मधुरिम एहसास सुभाषित हो।।
मत समझो कपोल कल्पना,स्वप्न सकल पूरित होंगे।।
तिमिर हटा आशाओं के,दीप सदा ज्योतित होंगे।।

अब पंख मिले मेरे सपनों को मैं आसमान उड़ जाऊं।
धवल सलोने स्वप्निल बादल,मैं धरती पर ले आऊं ।।
लाल बहादुर विवेकानंद ने कल्पना को आकार दिया।
कवि की ढाल बनी लेखनी,साधना को विस्तार दिया।।
( स्वरचित मौलिक)
नमिता गुप्ता
लखनऊ ( उत्तर प्रदेश)

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बहुत सुंदर रचना

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