Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings

दाल के तड़का

आईं – गाईं करत रहलें बस ,बात होत रहे बड़का -बड़का।
एक बार नहीं कई बार पुछाईल, एके बात के हड़का- हड़का।
समय से अगर तड़का मिली जइतें लास्ट बार के बात रहे,
अबकी बार बस पूछि लेंती ,बताव कब लगी दाल के तड़का।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

292 Views
You may also like:
इस तरह
Dr fauzia Naseem shad
【6】** माँ **
Arise DGRJ (Khaimsingh Saini)
मिसाले हुस्न का
Dr fauzia Naseem shad
काश मेरा बचपन फिर आता
साहित्य लेखन- एहसास और जज़्बात
"समय का पहिया"
Ajit Kumar "Karn"
गुलामी के पदचिन्ह
मनोज कर्ण
पहनते है चरण पादुकाएं ।
Buddha Prakash
✍️इंतज़ार✍️
Vaishnavi Gupta
याद पर लिखे अशआर
Dr fauzia Naseem shad
दो पल मोहब्बत
श्री रमण 'श्रीपद्'
महँगाई
आकाश महेशपुरी
पितृ स्तुति
दुष्यन्त 'बाबा'
गांव शहर और हम ( कर्मण्य)
Shyam Pandey
याद तेरी फिर आई है
Anamika Singh
रात तन्हा सी
Dr fauzia Naseem shad
'बाबूजी' एक पिता
पंकज कुमार कर्ण
दर्द ख़ामोशियां
Dr fauzia Naseem shad
गर्मी का कहर
Ram Krishan Rastogi
✍️हिसाब ✍️
Vaishnavi Gupta
नदी की अभिलाषा / (गीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
मजदूरों का जीवन।
Anamika Singh
दर्द इनका भी
Dr fauzia Naseem shad
" एक हद के बाद"
rubichetanshukla रुबी चेतन शुक्ला
मृगतृष्णा / (नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
फौजी बनना कहाँ आसान है
Anamika Singh
'फूल और व्यक्ति'
Vishnu Prasad 'panchotiya'
इज़हार
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
संविदा की नौकरी का दर्द
आकाश महेशपुरी
छीन लिए है जब हक़ सारे तुमने
Ram Krishan Rastogi
श्रम पिता का समाया
शेख़ जाफ़र खान
Loading...