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15 Nov 2023 · 1 min read

🥀 *अज्ञानी की कलम*🥀

🥀 अज्ञानी की कलम🥀
वतर्ज-छेड़ मिलन के गीत रे मितवा–
🥀स्थाई-🥀
-जीवन के दिन चार,है सिकवा।
ना ही रहा और ना ही रहेगा,नेकी पथ स्वीकार,है सिकवा।।जीवन के दिन चार,२–है सिकवा——
🥀अ•१-🥀
विधि की जग में कैसी है माया।
ज्ञानी भी समझ न पाया।प्रपंच है रचाया।
माया के सल कंद वो पारण,विधि का यह व्यवहार।है सिकवा, जीवन के दिन चार है।।२
🥀अ•२🥀
तम मानुष उभर न पाये।काल के गाल में जग समाये।विधि ने खेल रचाये।
आज्ञा पंचभूत जो वैसे हरती भूमि भार।
है सिकवा,जीवन के दिन चार है।।२–
🥀अ•३🥀
हानि लाभ बाथे ले विधि का।समझे नही लेख विधि का।भाग्य पढ़े न कीका।
आत्माराम मिलन हो किसी का,कैसे हो उद्धार।है सिकवा,जीवन के दिन चार है।।२—-
🥀अं•४🥀
विधि की माया विधि को भाये।जग में कोई समझ न पाये।काल के गाल में समाये।अज्ञानी पे ऐसी गुरु कृपा हो,
करियो जन विचार।।है सिकवा,जीवन के दिन चार है।।
जूनियर झनक कैलाश अज्ञानी झाँसी उ•प्र•

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