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1 Jul 2016 · 1 min read

सोचूं अब चोर ही बन जाऊँ…….

सोचूं अब चोर ही बन जाऊँ…….
_______________________________
डालूं डाका किसी बैंक
शाखा पर और निकाल लाऊँ
वो सब पैसे दे दूँ उन्हें जो
लाचार हैं बेबस हैं
———
चले जाऊँ चुपके से किसी
बड़े से दूकान पर तोड़
दूँ ताला उठा लाऊँ उन सभी कपड़ों को
और बाँट दूँ उन्हें मज़बूर हैं जो
रोड पर अपनी रात बिताने को
————
बना लूँ गैंग कोई अपनी भी
तमंचे भी साथ हो और
लगा दूँ कनपट्टी पर
उस मंत्री के और छुड़ा लाऊँ
उस गरीब की कब्जाई जमीन
——————–
सोचूं अब चोर ही बन जाऊँ…….
______________________________
रात का समय हो और
अंधेरा घना हो चला जाऊँ
किसी गोदाम में…
उठा लाऊँ वो ढेरों अनाज
जो रखे हैं जो दाम बढ़ाने को
और दे दूँ ज़रूरतमंदों को
———
सोचूं तोड़ दूँ वो कानून
और घोप दूँ चाकू उस
बलात्कारी पर, ले जाऊँ
ईंधन कोई और लगा दूँ
आग उस कोर्ट पर जो सजा
-ए मौत न देता हो
——–
मन करता है बना लूँ डेरा
उस प्रख्यात के घर के सामने
मौका देखकर उड़ा दूँ उसे
जो राष्ट्रहित में
अपमानजनक कहता रहा हो
_————
सोचूं अब चोर ही बन जाऊँ…….
_________________________________
_____________________________________ बृज

Language: Hindi
Tag: लेख
1 Like · 21 Comments · 981 Views
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