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28 May 2016 · 1 min read

सूर घनाक्षरी

पत्थर पहाड़ पत्ते, तपाये तपन तपें, आग आज अजगर, सा मुख फैलाये
आदमी आकुल अब, पशु- पक्षी दुखी सब, बुझाए बुझे न बुरे, हालात बनाये
पंख पसारे पवन, और उसारे अगन, अभिमानी मेघ बन, देखो इतराये
वन विभाग है कित, चिंता से चिंतित चित,यत्न युक्ति करो कोई, आग बुझ जाये

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