Sep 9, 2016 · 1 min read

समय

समय बदलते देर न लगती,
क्यों खोवे है आस ?
नव प्रभात फिर से आवेगा,
रख रे ऐसी आस ।
जब झेलेगा सिर पर अपने,
श्रम-घन की तू मार।
अवधूत तभी सुख का सूरज,
दे सकेगा उजास ।

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