श्री हनुमत् कथा भाग-1

आज से प्रत्येक मंगलवार को हनुमत् कथा -भाग-1
एकवार रावण के अत्याचार को समाप्त करने के लिए देवताओं ने सभा की जिसमें भगवान विष्णु ने कहा कि मैं दशरथ के पुत्र -राम के रूप में अवतार लूँगा और पृथ्वी को राक्षसों के अत्याचार एवं आतंक से मुक्त करके धर्म की स्थापना करूँगा ।भगवान् शिव से जब यह पूछा गया कि वे किस प्रकार सहायता करेंगे क्योंकि रावण ने अपने दशशीश समर्पित करके भगवान शिव के दश रूपों को प्रसन्न कर लिया है।तव शिव ने कहा कि रावण ने मेरे दश रूपों को ही प्रसन्न किया है। अभी मेरा ग्यारह वाँ रुद्रावतार अप्रसन्न है। मैं उसी रूप से सहायता करूँगा ।
इसी उद्देश्य से लीलाधर भगवान शिव भगवान विष्णु के पास-क्षीरसागर पहुँचे और बोले -हे भगवन्! मैंने समुद्रमन्थन के समय आपके मोहिनी रूप को नहीं देखा क्योंकि उस समय समुद्रमन्थन से उत्पन्न हलाहल बिष का पान कर लिया था ।इसलिए आपके उस रूप को देखना चाहता हूँ ।भगवान विष्णु बोले -हे कामारि!आप तो काम को भी भष्म करनेवाले हैं ।परन्तु आपका यह कामी रूप किसी बिशेष लीला करने के उद्देश्य से प्रकट हो रहाहै।तभी वहाँ सुन्दर से उद्यान में गैंद से खेलती हुई एक नवयौवना सुन्दरी प्रकट हुई जो कामी शिव को अपनी ओर आकर्षित करती हुई आगे चल रही थी। शिव कामी की तरह उसके पीछे दौड़े और मार्ग में उनका वीर्यपात हो जिसे वायुदेव ने कर्णमार्ग से माँ अंजना की कुक्षि में स्थापित कर दिया जिससे परम वलवन्त श्री हनुमन्त लाल का जन्म हुआ ।
शेष अगले अंक में
बोलो बजरंग बली की जय

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