Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
5 May 2024 · 1 min read

मेरे सिवा अब मुझे कुछ याद नहीं रहता,

मेरे सिवा अब मुझे कुछ याद नहीं रहता,
आईना देखूं तो तेरी सूरत बदल जाती है!!

31 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
You may also like:
हब्स के बढ़ते हीं बारिश की दुआ माँगते हैं
हब्स के बढ़ते हीं बारिश की दुआ माँगते हैं
Shweta Soni
सबूत- ए- इश्क़
सबूत- ए- इश्क़
राहुल रायकवार जज़्बाती
ग़ज़ल/नज़्म - ये प्यार-व्यार का तो बस एक बहाना है
ग़ज़ल/नज़्म - ये प्यार-व्यार का तो बस एक बहाना है
अनिल कुमार
राममय दोहे
राममय दोहे
राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
*घर में बैठे रह गए , नेता गड़बड़ दास* (हास्य कुंडलिया
*घर में बैठे रह गए , नेता गड़बड़ दास* (हास्य कुंडलिया
Ravi Prakash
नवगीत : हर बरस आता रहा मौसम का मधुमास
नवगीत : हर बरस आता रहा मौसम का मधुमास
Sushila joshi
मुस्कुरा दो ज़रा
मुस्कुरा दो ज़रा
Dhriti Mishra
हृदय द्वार (कविता)
हृदय द्वार (कविता)
Monika Yadav (Rachina)
"रचो ऐसा इतिहास"
Dr. Kishan tandon kranti
थक गई हूं
थक गई हूं
Suman (Aditi Angel 🧚🏻)
सत्साहित्य कहा जाता है ज्ञानराशि का संचित कोष।
सत्साहित्य कहा जाता है ज्ञानराशि का संचित कोष।
महेश चन्द्र त्रिपाठी
2448.पूर्णिका
2448.पूर्णिका
Dr.Khedu Bharti
मैं बेबाक हूँ इसीलिए तो लोग चिढ़ते हैं
मैं बेबाक हूँ इसीलिए तो लोग चिढ़ते हैं
VINOD CHAUHAN
" बेशुमार दौलत "
Chunnu Lal Gupta
"किसान का दर्द"
Dr. Asha Kumar Rastogi M.D.(Medicine),DTCD
बात पते की कहती नानी।
बात पते की कहती नानी।
Vedha Singh
मेरी जाति 'स्वयं ' मेरा धर्म 'मस्त '
मेरी जाति 'स्वयं ' मेरा धर्म 'मस्त '
सिद्धार्थ गोरखपुरी
धर्म और विडम्बना
धर्म और विडम्बना
Mahender Singh
ग़ज़ल
ग़ज़ल
Mahendra Narayan
खुशबू चमन की।
खुशबू चमन की।
Taj Mohammad
दुर्गा माँ
दुर्गा माँ
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
मेरी माटी मेरा देश
मेरी माटी मेरा देश
Dr Archana Gupta
क्यों आज हम याद तुम्हें आ गये
क्यों आज हम याद तुम्हें आ गये
gurudeenverma198
जिंदगी मैं हूं, मुझ पर यकीं मत करो
जिंदगी मैं हूं, मुझ पर यकीं मत करो
Shiva Awasthi
मधुशाला में लोग मदहोश नजर क्यों आते हैं
मधुशाला में लोग मदहोश नजर क्यों आते हैं
कवि दीपक बवेजा
खुद के हाथ में पत्थर,दिल शीशे की दीवार है।
खुद के हाथ में पत्थर,दिल शीशे की दीवार है।
Priya princess panwar
इंसानो की इस भीड़ में
इंसानो की इस भीड़ में
Dr fauzia Naseem shad
एक लम्हा है ज़िन्दगी,
एक लम्हा है ज़िन्दगी,
डॉ. शशांक शर्मा "रईस"
दोनों हाथों की बुनाई
दोनों हाथों की बुनाई
Awadhesh Singh
अजब प्रेम की बस्तियाँ,
अजब प्रेम की बस्तियाँ,
sushil sarna
Loading...