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5 Jul 2023 · 1 min read

मेघ

मेघ
बरस जाया करो
बिना मनुहार
कभी कभी
ऐसे ही
तुम्हारे बरसने से
प्रकृति ही नहीं
सूखा मन भी
हरिया जाता है

मेघ
क्या करे
वो तो चाहता है
सूखे मन को
तर कर दे
हरिया दे
पर
वो भी बेबस है
हवा पर उसकी निर्भरता
उसको प्रिय के घर
बरसने का
मौका नहीं दे रही
इधर उधर
बहा ले जा रही है
वो भी ढूंढ रहा है
उस ठिकाने को
बरसने के लिए
जहाँ पपीही उसका
इंतज़ार कर रही है

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