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27 Jan 2024 · 1 min read

मुक्तक

हुई छलकते जाम से, मस्त नशीली शाम।
नज़रों के खंजर चले, इश्क हुआ बदनाम।
बाहों में फिर हुस्न का, ऐसा चढ़ा सुरूर –
तन्हाई में दे दिया, उल्फत को अंजाम।

सुशील सरना

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