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Mar 9, 2019 · 1 min read

मुक्तक !

मेरा बचपन मेरे दामन को छोड़ती ही नही
जब भी छुड़ाती हूँ और जोर से लिपट जाती है !

**
हमें अपने घऱ-आंगन गए जमाने हो गए
माँ के हाँथ से खाना खाए और डांट पिए
बातें जो सुहाने थे अब वो पूराने हो गए !
**
फूलों का हँसना-रोना देखा है, तितलियों का रंग बदलना देखा है
अपने बचपन में माँ को ‘काली माँ’ होते और खुद को डरते देखा है !
**
।।सिद्धार्थ।।

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