Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
17 Jul 2016 · 9 min read

मिशन इज ओवर

अनायास विकास एक दिन अपने गाँव लौट आया. अपने सामने अपने बेटे को देखकर भानु प्रताप चौधरी के मुँह से हठात निकल गया -“अचानक ….. कोई खास बात ……?” घर में दाखिल होते ही प्रथम सामना पिता का होगा, संभवत: वह इसके लिए तैयार न था, परिणामत: वह पल दो पल के लिए सकपका गया …………. किन्तु, अगले ही क्षण स्वयं को नियंत्रित कर तथा अपनी बातों में सहजता का पुट डालते बोला – ” ख़ास तो कुछ नहीं पिताजी, एम०ए० की पढ़ाई ख़तम कर गाँव में ही रहकर कुछ करने का विचार है, सो वापस आ गया.क्या करना ठीक होगा, इस पर आपसे राय – विचार करूंगा.” पिताजी के चेहरे का भाव पढ़ने की ज़हमत उठाये बिना वह अपनी माँ से मिलने भीतर चला गया.बेटे के इस बदलाव पर चौधरी साहेब को सुखद आश्चर्य हुआ.भानु प्रताप चौधरी के पास खेती -बारी की अच्छी -खासी ज़मीन थी,इसके अलावा लम्बा-चौड़ा कारोबार भी था.वह शुरू से ही चाहते थे कि विकास अपनी पढ़ाई पूरी करके गाँव में ही रहकर उनकी मदद करे.माँ भी विकास की यह बात सुनकर निहाल हो उठीं.उन्हें अपनी कोख पर गर्व हो आया,होता भी क्यों नहीं ……………? पिताश्री की आज्ञा का लफ्ज़- ब-लफ्ज़ पालन कर विकास ने सपूत होने का प्रमाण जो दिया था.
माता -पिता को निहाल कर विकास जब अपने कमरे में आया तो वह हकीकत उसे पुन: गलबाँही देने लगी, जिसे बार -बार झटकने का नाकाम प्रयास पिछले कई दिनों से वह करता आ रहा था. सच से भाग रहे इंसान को एकांत काट खाने को दौड़ता है. न चाहते हुए भी विकास के मानस -पटल पर अतीत सजीव हो उठा ………………………….एम ० ए० की परीक्षा के दौरान ही विकास की तबीयत खराब होने लगी थी. दवा खा -खा कर जैसे -तैसे उसने परीक्षा दी थी. ……………………. परीक्षा ख़तम होते ही वह डॉक्टर से मिला …………….. चिकित्सा -क्रम में ही जांचोपरांत उसे एच ० आई ० वी० पौजेटिव करार दे दिया गया था. डॉक्टर ने उसे काफी ऊँच-नीच समझाया था …………. ढाढ़स बंधाया था ,पर एड्स का नाम सुनकर विकास सूखे पत्ते की तरह काँप उठा. वह जानता था ……………. एड्स के साथ जीने वालों को समाज किस तरह अपने से दूर कर देता है ……….. किस तरह उनकी उपेक्षा की जाती है ……………. लोग किस तरह उनसे कटने लगते हैं ……….. घृणा करने लगते हैं. लगभग घसीटते हुए उस दिन वह खुद को हॉस्टल तक ला पाया था.उसे आज भी अच्छी तरह याद है, कई दिनों तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकला था.हर पल एक ही प्रश्न उसके दिलो -दिमाग में कौंधता रहता ……………. अब क्या होगा …..? …………… निराशा के गर्त्त में उसका वजूद कतरा – कतरा डूबता जा रहा था कि अचानक उसका विवेक जाग उठा ……………. मरने से पहले क्यों मरना ? जिजीविषा ने उसका दामन थाम लिया ………………. जीवन कभी निरर्थक नहीं होता …………… हर जीवन का कोई मकसद होता है ……. . वह मन ही मन बुदबुदा उठा …………….. क्या मेरे जीवन का भी कोई मकसद है ? …………….. आभास हुआ ,कोई मद्धिम, पर दृढ़ स्वर में कह रहा है ……… निःसंदेह ………. पर वो मकसद है क्या —- इंसान अगर जीने का मकसद खोज ले तो निराशा स्वत: दम तोड़ देगी. विकास को निराशा के गहरे अँधेरे कुंए में आशा की एक टिमटिमाती रोशनी नज़र आई,उसने मन ही मन सोचा -” क्यों न एड्स के साथ जी रहे लोगों के पुनर्वास और उनके प्रति लोगों के दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव को अपने जीवन का मकसद बना लूँ ?”…………….. और धीरे -धीरे यह सोच दृढ़ संकल्प बन गया. विकास ने महसूस किया कि उसकी जिजीविषा अंगड़ाई लेकर जाग उठी है. उसने खुद को हल्का महसूस किया.
आज कई रोज के बाद विकास शाम को कमरे से बाहर निकला और सुनीता से मिलने मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल जा पंहुचा . उसने सुनीता को बिना वजह बताए अपने गाँव जाने की बात बताई और बिना उसका जवाब सुने, बिना उसकी तरफ देखे, वहाँ से वापस हो लिया . उसने सुनीता को कुछ कहने का मौका नहीं दिया . उसकी कानो में क्रमशः क्षीण पड़ती जा रही सुनीता की आवाज़ अभी भी आ रही थी- ‘विकास सुनो ……विकास रुको………… विकास रुका तो . ‘ लेकिन न तो वह रुका और न ही पलट कर सुनीता की तरफ देखा . चलते समय उसने सुनीता को अपना कोई पता-ठिकाना भी नहीं बताया था .
अब विकास के सामने उसके जीवन का मकसद और भी स्पष्ट हो चुका था . वह जानता था कि इस मकसद को अमली-जामा पहनाने में उसके बचपन का मित्र रहमत अली मदद कर सकता है . रहमत अली जन-सेवा एवं समाज-सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर चुका था .
विकास गाँव आकर रहमत अली से मिला . वह मन ही मन काफी देर से सोच रहा था कि रहमत से अपनी बात कहे तो कहे कैसे? अगर ईरादा पक्का हो तो राहें खुद-ब-खुद निकल आती हैं . दोनों बातचीत करते हुए गाँव के मध्य से गुजर रहे थे, अचानक कुछ शोरगुल सुनायी पड़ा . एक घर के सामने भीड़ लगी हुई थी . दोनों उस घर के सामने आकर खड़े हो गए . गाँव में रहमत अली की न सिर्फ प्रतिष्ठा थी बल्कि वह लोगों में काफी लोकप्रिय भी था . ग्रामोत्थान ,नारी-जागरण ,साक्षरता जैसी कई स्वयं सेवी संस्थायें रहमत अली के संरक्षण में चल रही थीं . वहां पहुचने पर दोनों को मालुम हुआ कि रामलाल अपने छोटे भाई श्यामलाल को घर से निकाल रहा है और गाँव वाले भी रामलाल का ही साथ दे रहें हैं . पूछने पर रामलाल ने रहमत अली को बताया कि-‘मेरे भाई को एड्स हो गया है,अब भला मैं इसे घर में कैसे रख सकता हूँ?’
विकास की आशा के विपरीत रहमत अली इस मामले पर खामोश रह गया ………
विकास के पूछने पर अली ने कहा- ‘एड्स के मामले में भला मैं क्या बोल सकता हूँ?………..सच पूछो तो गाँव में इसका रहना उचित भी नहीं है . ‘ विकास ने रहमत अली को काफी ऊँच-नीच समझाया………..एड्स के साथ जी रहे लोगों के बारे में बताया…..इससे जुड़े मानवीय पक्षों को उसके सामने रखा …..नहीं बताया तो सिर्फ़ यह कि वह भी एड्स के साथ ही जी रहा है . विकास ने रहमत अली से अनुरोध किया कि एड्स के साथ जी रहे लोगों के पुर्नवास एवं सहायता की दिशा में स्वयं सेवी संस्थायें कारगर भूमिका निभा सकती हैं और रहमत इस तरह की संस्था का संचालन कर सकता है . विकास की इस बात पर रहमत उसकी तरफ देखते हुए बोला -‘यदि तुम इस संस्था की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो तो मुझे कोई एतराज नहीं है . ‘ अंधे को क्या चाहिए?……..दो आँखे …………..विकास तन-मन-धन से संस्था के कामो में लग गया . रामलाल के भाई के पुर्नवास से ही संस्था का श्री गणेश हुआ . विकास की लग्न एवं मिहनत तथा रहमत अली की साख़ उसके अनुभव एवं समाज-सेवा के प्रति उसके समर्पण भाव के कारण एड्स के साथ जी रहे लोगों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में सकारात्मक के लक्षण दिखने लगे .
विकास को अपने बारे में अपनी माँ को बताने के लिए तब बाध्य हो जाना पड़ा, जब वह उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी . विकास की बातें सुनकर उसकी माँ को चक्कर आ गया . उन्होंने रोते हुए जब यह बात अपने पति भानु प्रताप चौधरी से कहा तो वह सर पकड़कर कर बैठ गए . ऐसी स्थिति-परिस्थिति में शायद पुरुष को अपने उत्तरदायित्व का बोध तुरंत होता है . स्वयं पर नियंत्रण करने का प्रयास करते हुए चौधरी साहेब ने अपनी पत्नी को समझाने के लहजे में हिदायत दी -‘किसी को इस बात की भनक तक नहीं लगनी चाहिए, अन्यथा अपना बेटा मौत से पहले ही मर जाएगा . ‘ फिर बुजुर्ग दंपत्ति अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने बेटे को अधिक से अधिक खुश रखने का प्रयत्न करने लगे . चौधरी साहेब ने अपनी पत्नी को बता दिया था कि यह कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है . विकास को आभास नहीं होना चाहिए कि यह जानने के बाद हमारे व्यवहार में कोई बदलाव आ गया है . विकास की माँ उसे अब अपने हाथों से खाना खिलाती,उसे घंटों अपने पास बिठा कर रखती और अपनी बुढ़ी आँखों से अपनी कोख की उस जवानी को, जिसकी कहानी का समापन नियति ने नियत कर दिया था, निहारती रहती.
एक दिन रहमत अली विकास के घर सुबह-सुबह ही पहुँचा . वह काफी खुश था . उसने विकास को बताया कि हमारी संस्था का नाम दूर-दूर तक फैल चुका है . कल देर शाम शहर से एक लेडी डॉक्टर स्वेच्छा से अपनी सेवा चिकित्सा-सेवा संस्था को देने के लिए यहाँ आ गयी हैं, उनका कहना है कि इस नेक काम में वह हमारे साथ हैं . रहमत का कहना था कि यदि एक डॉक्टर कुछ समझाये तो लोग आसानी से एतबार कर सकते हैं . रहमत की इस बात से विकास भी पूरी तरह सहमत था . डॉक्टर से मिलने के लिए विकास रहमत के साथ तुरंत चल पड़ा, लेकिन जब वह लेडी डॉक्टर से मिला तो उसके पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गयी ………वक़्त की आँधी एक बार फिर अतीत के पन्नों को फड़फड़ाने लगी……….. सामने सुनीता खड़ी थी . दोनों एक दूसरे को देखकर हतप्रभ थे,पर रहमत अली पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि दोनों पूर्व परिचित हैं…………शिष्टाचार को प्राथमिकता देते हुए दोनों ने एक दूसरे को नमस्कार किया, पर एकांत मिलते ही विकास खुद को रोक नहीं पाया और सुनीता से पूछ बैठा –‘ तुम यहाँ?….गाँव में?…शहर में पली-बढ़ी, सुकुमार लड़की…यह किस रास्ते पर चल पड़ी हो?……तुम्हारी शादी हुयी?…तुम्हारे डैडी यहाँ आने…………. ‘ सुनीता ने बीच में ही टोकते हुए कहा–‘सिर्फ तुम्ही बोलना जानते हो क्या?………मैं शहर की हूँ….. गाँव में कैसे रहूँगी……..मेरी शादी हुयी या नहीं………. ‘ कहते-कहते क्षण भर को सुनीता ठहर गयी….स्थिर नज़रों से एक पल के लिए उसने विकास को देखा…………पल दो पल के लिए दोनों की नज़रें आपस में मिलीं……….भाषा सिर्फ ज़ुबां की ही नहीं होती,नज़रों की भी अपनी भाषा होती है . एक पल में ही जानें कितनी बातें हो गयीं . दूसरे ही पल एक झटके से सुनीता ने अपनी नज़रे फेर ली और बीच में छोड़ी हुयी अपनी बात पर आ गयी . उसने विकास को धिक्कारते हुए कहा-‘तुम तो अपना फरमान सुनाकर चल दिए..अपना पता- ठिकाना , कुछ तो नहीं बताया……. एक पल को भी यह नहीं सोचा कि किसी के अरमानों पर कुठाराघात करके जा रहे हो………..? तुम्हारे जाने की बात सुनकर मेरे दिल पर क्या …….. ‘ कहते -कहते सुनीता का गला रूँध गया . अपनी आँखों में बिन चाहे भी छलक आये अश्कों को छिपाने का असफल प्रयास करते हुए सुनीता ने कहा ‘ तुमने तो यह सब जानना भी जरुरी नहीं समझा……..मैंने तो कभी सोचा भी न था कि हम दोनों फिर से एक दूसरे के सामने इस तरह से आ खड़े होंगे . ………… विकास,तुम्हें नहीं लगता ………… कि मुझे लेकर तुम्हें संजीदा होने का अब कोई हक नहीं? ……………. अपनी ज़िन्दगी अपने ढँग से गुजारने का मुझे पूरा अधिकार है………. मैं एक डॉक्टर हूँ………. और एड्स के साथ जी रहे लोगों के लिए काम करने को अपने जीवन का मिशन बनाया है…….. ‘ सामने से रहमत अली को आते देख सुनीता को बीच में ही चुप हो जाना पड़ा .
डॉक्टर सुनीता के आ जाने से संस्था पहले से अधिक सार्थक एवं सकारात्मक ढंग से काम करने लगी और परिणाम भी नज़र आने लगा . रामलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह अपने छोटे भाई श्यामलाल को ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर ले गया . रामलाल को ऐसा करते देख कई लोग अपने परिजनों को अपने साथ ले गए . एड्स के साथ जी रहे लोगों के पुर्नवास की दिशा में संस्था के बढ़ते कदम से रहमत अली गद्गद थे .
विकास अब संस्था के काम में पहले की तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा था, तुरंत उसे थकान महसूस होने लगती थी . रहमत अली से अब और अपनी बीमारी छिपाना उसे उचित नहीं लगा . जब विकास रहमत अली को अपनी बीमारी के बारे में बताया तो वह सन्न रह गए, कुछ पल हा किये फटी-फटी नज़रों से वह विकास को देखते रहे . विकास के लाख मना करने के बावजूद रहमत अली उसे डाँ.सुनीता के पास ले गए . विकास को बाहर बिठा कर रहमत अली अकेले ही सुनीता से मिलकर उसे विकास के बारे में बताया . विकास की बीमारी की बात सुनकर सुनीता को महसूस हुआ कि उसके कानों के पास बम सदृश धमाका हुआ है, वह बेजान पावों पर उठ खड़ी हुयी और बिना कुछ बोले अंदर चली गयी . सुनीता का यह रवैया रहमत अली को नागवार लगा . जब सुनीता वापस लौटी तो उसकी आँखें छोटी और लाल थीं . सुनीता के इशारे पर रहमत अली विकास को उसके पास ले आया,सुनीता पलकें उठाकर विकास को देखा-यह क्या ?………..उसकी बोलती आँखें खामोश हो चुकीं थीं और उसने दूसरे ही पल पलकें झुका ली . डाँ.सुनीता ने विकास का कई तरह से चेकअप किया . रहमत अली की नज़रें सुनीता के चेहरे पर ही टिकी हुयी थीं और चेकअप के दौरान सुनीता के चेहरे पर आ-जा रहे भाव को देखकर रहमत का दिल बैठा जा रहा था . चेकअप करने के बाद सुनीता कुछ पल के लिए खामोश हो गयी, उसकी आँखें भर चुकी थीं ………….. क्षीण आवाज में सुनीता ने विकास से कहा- ‘योर मिशन इज ओवर ‘ और फिर वह झटके से उठकर भीतर चली गयी .

Language: Hindi
Tag: कहानी
1 Comment · 193 Views
You may also like:
मोहब्बत ही आजकल कम हैं
Dr.sima
अनवरत का सच
Rashmi Sanjay
स्कूल का पहला दिन
सुरेश कुमार चतुर्वेदी
चमचागिरी
सूर्यकांत द्विवेदी
भूख
Saraswati Bajpai
'सती'
Godambari Negi
संस्कार - कहानी
अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'
बेटियां
Shriyansh Gupta
घोर अंधेरा ................
Kavita Chouhan
अमृत महोत्सव
विजय कुमार अग्रवाल
ग़म-ए-दिल....
Aditya Prakash
पिता
dks.lhp
✍️ 'कामयाबी' के लिए...
'अशांत' शेखर
हम हक़ीक़त को
Dr fauzia Naseem shad
शेर
Rajiv Vishal
एक प्यार ऐसा भी /लवकुश यादव "अज़ल"
लवकुश यादव "अज़ल"
उसके मेरे दरमियाँ खाई ना थी
Khalid Nadeem Budauni
तुम्हारा देखना ❣️
अनंत पांडेय "INϕ9YT"
एक ज़िंदा मुल्क
Shekhar Chandra Mitra
प्रतीक्षा करना पड़ता।
विजय कुमार 'विजय'
*मोबाइल उपहार( बाल कुंडलिया )*
Ravi Prakash
याद आयेंगे तुम्हे हम,एक चुम्बन की तरह
Ram Krishan Rastogi
एक फूल खिलता है।
Taj Mohammad
ग्रह और शरीर
Vikas Sharma'Shivaaya'
भगवान रफ़ी पर दस दोहे
महावीर उत्तरांचली • Mahavir Uttranchali
पोहा पर हूँ लिख रहा
Dr. Rajendra Singh 'Rahi'
“ অখনো মিথিলা কানি রহল ”
DrLakshman Jha Parimal
ये कैसी आज़ादी - कविता
डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
पढ़ी लिखी लड़की
Swami Ganganiya
नशा मुक्त अनमोल जीवन
Anamika Singh
Loading...