Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
27 Feb 2023 · 4 min read

मनमोहन छंद विधान ,उदाहरण एवं विधाएँ

मनमोहन छंद 14 मात्रा (8+6) पदांत नगण
चारों चरण या दो- दो चरण समतुकांत
सही विधान- अठकल +किसी भी तरह का त्रिकल + नगण अर्थात पदांत 111 )
कुछ विद्वान कवि , अठकल की यति के बाद शेष छक्कल , चौकल +द्विकल के रुप में इस तरह आ रहा हो कि चौकल का अंतिम वर्ण लघु हो व द्विकल दोनों लघु हो | उसको मान्य करते है , आशय वही निकला कि चरणांत नगण 111 हो | और मैं भी इस पर असहमति नहीं देता हूँ , यदि कवि का सृजन लय में जरुरी लग रहा है , तब आपत्ति नहीं है

(इसको द्विगुणित करने पर ‌स्वाभाविक रुप से महा मनमोहन छंद कहलाएगा )जिस तरह शृंगार छंद का द्विगुणित महा शृृंगार छंद कहलाता है ,
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद

रावण जैसी जहाँ हपस |
उसकी लंका सहे तपस ||
जलकर होगी खाक जरुर |
मद का उतरे सभी शरुर ||

सच्चे की है बात अलग |
झूठाँ होता अलग-थलग ||
आँखें जाती वहाँ झलक |
करें इशारा वहाँ पलक ||

सच्चा होता जहाँ कथन |
मानव करता वहाँ मनन ||
खिलता उपवन बने चमन |
जग करता है वहाँ नमन ||

छिपा न रहता किया गबन |
अधिक चले मत कभी दमन ||
संत बोलते सत्य वचन |
सदा झूठ का करो हवन ||

जिसका होता‌ हृदय सरल |
पी जाते है सदा गरल ||
उन पर होता नहीं असर |
करते‌ रहते गुजर – बसर ||

सुभाष ‌सिंघई
~~~~~~~~~~~~
(मुक्तक )मनमोहन छंद , 14 मात्रा (8+6)
( किसी भी तरह का अठकल +किसी भी तरह का त्रिकल + नगण अर्थात पदांत 111 )

जो करते है सदा‌ नकल |
नहीं लगाते‌ वहाँ अकल ||
मूरख बनकर करें गुजर ~
काम हमेशा चले धकल |

जो करते है घात अमल |
खिले न घर में कभी कमल |
काँटो की ही उगे फसल ~
रहते है वह हृदय मसल ||

करता दानी सदा पहल |
मंदिर मस्जिद करे चहल |
सृजन हमेशा करे निरत ~
जन सेवा को तजे महल |

सुभाष ‌सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~

🍒💐शारदे वंदना‌💐🍒
मनमोहन छंद ( अठकल + त्रिकल + नगण ) √

मात् शारदे तुझे नमन |
रहे वतन में सदा अमन ||
मन से निकले यही कथन |
भारत हरदम रहे चमन ||

माता‌ तेरा करूँ भजन |
चरणों में नित रहूँ मगन ||
पूजा तेरी करे कलम |
छाए गहरा निकट न तम ||

वीणाधारी वस्त्र धवल |
पावन तेरे चरण कमल |
छंद रचूँ मैं सदा नवल |
कह सुभाष अब दास चपल ||

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~

मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111 √

अच्छी होती , नहीं कलह |
लोग लड़े भी, बिना बजह ||
अपना-अपना , कहें कथन |
खुद ही अपना , करें नमन ||

बनते जग में , सभी सरल |
भरें हृदय में , खूब गरल ||
नहीं पराया , करें सहन |
मन में रखते , सदा जलन ||

साधू होते , निर्मल जल |
उनके होते , सुंदर पल ||
राग द्वेश से , दूर बचन |
अमरत उनके , सदा कथन ||

सुभाष ‌सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111 (मुक्तक )√

खल करता है , जहर वमन |
कुढ़ता रहता , रखे जलन |
ज्वाला भीतर , रखे दहक ~
उसका होता, नहीं शमन ||

जो होती है , बात सहज |
दुर्जन खाएं , वहाँ मगज |
बात घुमाता , करे चुभन –
बिन पानी का , दिखे जलज |

बात निराली , दिखे अलग |
नहीं सत्य से ,कभी बिलग ||
दर्शन जिनका सत्य सहज –
उनका करता , दर्शन जग |

सुभाष ‌सिंघई

~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111

अधिकारों का , जहाँ हनन |
उन्नति करता , नहीं वतन |
यश उन्नति का , जहाँ बिगुल |
देश बने वह , सदा मुकुल ||

आर पार की बात प्रखर |
आगे पीछे नहीं जहर ||
सत्य सदा ही करे चमक |
पुष्प छोड़ते सदा महक ||

आज सामने छंद महल |
करता नूतन सदा पहल ||
मित्र जुड़े सब करे सृजन |
चिंतन करते करे मनन ||
~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद(गीतिका ) अदांत गीतिका

करते रहना बात अमन |
पास खिलेगा सुखद चमन |

लोग भरोसा करे सहज,
यश पायेगा, निजी कथन |

मन दर्पण हो जहाँ सरल ,
अमरत बनते वहाँ वचन |

ज्ञानी है अनमोल जगत ,
मिलता उसको सदा नमन |

मेहनत का है जहाँ दखल ,
सोना खिलता सहे तपन |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद (गीत )

जहाँ घास का करें बजन |
नहीं वीरता काम सजन ||

करते रहते सदा दखल |
खूब लगाते निजी अकल ||
सदा तोड़ते बना महल |
करते रहते चहल- पहल ||

लड़वाने को कहें वचन |
नहीं वीरता काम सजन ||

बेतुक गाते ‌ सदा गजल |
मुख से निकले फटी हजल ||
चौखाने को कहें त्रिकल |
करें ढ़िढ़ोरा द्वार निकल ||

देते सबको खूब तपन |
नहीं वीरता काम सजन ||

ढींगे हाँके टहल-टहल |
हर कारज में करें दखल ||
उकसाने की करें पहल |
जाते मानव वहाँ दहल ||

करे सुभाषा यहाँ मनन |
नहीं वीरता काम सजन ||

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~
महा मनमोहन छंद

रख सुभाष अब हृदय विनय, प्रातकाल कर ईश नमन |
धोखा चोखा रखो समझ , जीवन होगा सुखद चमन ||
झूठा समझो यहाँ जगत , नहीं छोड़ना कभी भजन |
उसकी रहमत करे सफल , राह मिलेगें सरल सजन ||
|

(इस छंद में ” उसकी रहमत पाकर चल ” कर सकते थे , – पाकर चल ( पाक +र + चल = यति या पदांत नगण 111 ही बनता )
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
महा मनमोहन छंद( मुक्तक ) ,

जिनके कारज करें अमन , वह होता है सदा सरल |
शिव शंकर वह बने सहज , पी जाता है सभी‌ गरल |
देता है वह उदाहरण , अपनाता है आकर जग ~
अपनी रखता बात महज , जो लगती है सभी तरल |

तीसरे चरण में ” आकर जग ” भी एक त्रिकल व एक त्रिकल नगण बना रहा है , आप अपने सृजन में ऐसा संयोग आने पर प्रयुक्त कर सकते है
~~~~~~~~~~~~~~
महा मनमोहन छंद(गीतिका )
स्वर – आ , पदांत महल

बजी ईंट से ईट दहल , फिर भी मानें खड़ा महल |
पत्थर जिसके करे टपक , वह कहता है कड़ा महल |

गरल सींचते खड़ी फसल, पुस्तक रखने नहीं रहल |
उनकी‌‌ लीला दिखे अजब , कहते मेरा जड़ा महल ||

झूँठ बोलते बात सहज , जिनको कोई नहीं गरज ,
बिखरे कंकण जहाँ दखल ,वे कहते है मड़ा महल |

धूल धूसरित जहाँ अकल , जिस पर होते वार सहज ,
दिखे नही कुछ चहल पहल , वह कहते है लड़ा महल |

अपने स्वर को कहें गजल , जिनकी बोली नहीं सरस ,
बेमतलब की करें टहल , बीच राह में गड़ा महल |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~
सुभाष ‌सिंघई
आलेख उदाहरण ~ #सुभाष_सिंघई , एम. ए. हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र , निवासी जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

Language: Hindi
505 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
You may also like:
कावड़ियों की धूम है,
कावड़ियों की धूम है,
manjula chauhan
तुम
तुम
Sangeeta Beniwal
भावनाओं का प्रबल होता मधुर आधार।
भावनाओं का प्रबल होता मधुर आधार।
surenderpal vaidya
भारत वर्ष (शक्ति छन्द)
भारत वर्ष (शक्ति छन्द)
नाथ सोनांचली
*
*"जहां भी देखूं नजर आते हो तुम"*
Shashi kala vyas
2379.पूर्णिका
2379.पूर्णिका
Dr.Khedu Bharti
इश्क़ में सरेराह चलो,
इश्क़ में सरेराह चलो,
डॉ. शशांक शर्मा "रईस"
The Day I Wore My Mother's Saree!
The Day I Wore My Mother's Saree!
R. H. SRIDEVI
इंसान का मौलिक अधिकार ही उसके स्वतंत्रता का परिचय है।
इंसान का मौलिक अधिकार ही उसके स्वतंत्रता का परिचय है।
Rj Anand Prajapati
बेसब्री
बेसब्री
PRATIK JANGID
हर एक चेहरा निहारता
हर एक चेहरा निहारता
goutam shaw
चोला रंग बसंती
चोला रंग बसंती
सुशील मिश्रा ' क्षितिज राज '
ईमान धर्म बेच कर इंसान खा गया।
ईमान धर्म बेच कर इंसान खा गया।
सत्य कुमार प्रेमी
नाकामयाबी
नाकामयाबी
भरत कुमार सोलंकी
इंसान समाज में रहता है चाहे कितना ही दुनिया कह ले की तुलना न
इंसान समाज में रहता है चाहे कितना ही दुनिया कह ले की तुलना न
पूर्वार्थ
कुछ मन की कोई बात लिख दूँ...!
कुछ मन की कोई बात लिख दूँ...!
Aarti sirsat
- अब नहीं!!
- अब नहीं!!
Seema gupta,Alwar
गज़ल सी रचना
गज़ल सी रचना
Kanchan Khanna
खुश रहने वाले गांव और गरीबी में खुश रह लेते हैं दुःख का रोना
खुश रहने वाले गांव और गरीबी में खुश रह लेते हैं दुःख का रोना
Ranjeet kumar patre
*लव इज लाईफ*
*लव इज लाईफ*
Dushyant Kumar
*श्री हनुमंत चरित्र (कुंडलिया)*
*श्री हनुमंत चरित्र (कुंडलिया)*
Ravi Prakash
स्त्री:-
स्त्री:-
Vivek Mishra
मुझको बे'चैनियाँ जगा बैठी
मुझको बे'चैनियाँ जगा बैठी
Dr fauzia Naseem shad
"जरा देख"
Dr. Kishan tandon kranti
प्रेम पीड़ा
प्रेम पीड़ा
Shivkumar barman
खामोश आवाज़
खामोश आवाज़
Dr. Seema Varma
वो गुलमोहर जो कभी, ख्वाहिशों में गिरा करती थी।
वो गुलमोहर जो कभी, ख्वाहिशों में गिरा करती थी।
Manisha Manjari
खाली मन...... एक सच
खाली मन...... एक सच
Neeraj Agarwal
होली (विरह)
होली (विरह)
लक्ष्मी सिंह
बस हौसला करके चलना
बस हौसला करके चलना
SATPAL CHAUHAN
Loading...