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1 Jul 2021 · 9 min read

बटेसर

अजायबघर हेतु सृजित उस अद्भुत वाहन पर बैठते समय दिन के ठीक बारह बज रहे थे. जून का उत्तापयुक्त महीना था. सूर्य की किरणें आग विखेर रही थीं. पशु-पक्षी, सभी छाए में दुबके पडे़ थे. टैक्सी भी अद्वितीय थी. बादलों-सी उसकी गड़गड़ाहट सम्पूर्ण वातावरण को संगीतमय बना रही थी. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसका सम्पर्ण अस्तित्व खतरे में है. बावजूद इसके लोग बोरे जैसे उसमें लदे थे. एक के ऊपर एक. सुई भी रखने का स्थान शेष न था. यह एक अनोखे भारतीय परिवहन प्रणाली का एक नमूना है. फिर भी मुझे वह टैक्सी, जिसे टैक्सी कहना टैक्सी का अपमान है, पकड़नी पड़ी थी. पसीने से लथ-पथ होने के बावजूद उसमें लदना ही विकल्प था. अगल-बगल बैठे लोग धक्का-मुक्की भी कर रहे थे. इंजन से गर्म हवा लगातार अन्दर आ रही थी. मेरी यात्रा असहज होती जा रही थी. इसी दौरान वह वाहन, जिसे टैक्सी कहा जा रहा था, ने विराम लिया. कुछ लोग टैक्सी के अन्दर के वातावरण से उकताकर अगल-बगल झांकना प्रारम्भ कर दिए. मैं भला पीछे क्यों रहता. मैंने भी ताक-झांक की. टैक्सी के अन्दर की उमस से बाह्य उष्णता मनोहारी थी.
वाहन रूकने का एक कारण था. कुछ और लोग लदने वाले थे. ड्राइवर लदान से तनिक भी विचलित नहीं हो रहा था. सवारी देखकर उसकी आँखें चमक जाती थीं. इसी बीच चुम्बकीय व्यक्तित्व का धनी एक व्यक्ति उसी टैक्सी में बैठने के लिए हाथ दिया था. स्वस्थ्य एवं आकर्षक काया. मैं अन्तर्लीन देखता रह गया था. मैं अगली सीट पर बैठा था. प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी वह नव यात्री भी आगे वाली सीट पर बैठने को आतुर था. टैक्सी की दयनीय स्थिति प्रत्येक यात्री को आगे वाली सीट पर बैठने के लिए मजबूर-सी कर रही थी. मेरे बगल में बाहर की ओर एक और यात्री बैठा था. स्वाभाव से ही वह रार लग रहा था. वह नव यात्री को घुसने नहीं दे रहा था. ऐसी स्थिति में मैं अपने को रोक न सका. विवश होकर मुझे उतरना पडा़. वैसे भी मैं उस रार व्यक्ति से क्षुब्ध हो गया था. यात्रा के दौरान वह बार-बार झपकी लेता था. जैसे वर्षों बाद उसे नींद आई हो. उसके इस कृत्य से मैं उद्विग्न हो गया था. उतरकर उन्हें बैठने के लिए बोला. धन्यवाद ज्ञापन के बाद वह बैठ गए. मेरी विवशता और उनकी चतुरता का सम्मिलन हुआ. और उनके अड़सने के बाद मै भी किसी तरह उसी में अड़स गया. टैक्सी फटफटाई और चल दी. रफ्तार की बात करनी बेमानी होगी.
कुछ क्षण हम लोग मूक बैठे रहे. परन्तु बृजकिशोर बाबू की आँखों में न जाने कैसा जादू था. मैं ज्यादे देर मौन न रह सका. बतियाना भी था. यात्रा कैसे कटती. वार्ता का क्रम परिचय से प्रारम्भ हुआ. और फिर प्याज के छिलके की तरह उनकी स्मृति परत-दर-परत उघड़ने लगी.
बृजकिशोर बाबू ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आन्दोलन में सक्रिय सहयोग दिया था. स्वाधीनता संग्राम के तृतीय चरण- गाँधी युग में कांग्रेस वह सक्रिय थे. सन् 1942 में जब गॉँधीजी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ किया, तब बृजकिशोर बाबू भी अपने को रोक न सके. इस आन्दोलन के साथ वह हृदय से जुड़ गए थे. अंग्रेज अफसरों के कोडे़ भी खाए. बेंत की मार भी सही. परन्तु देश सेवा करते रहे. युवकों को प्रोत्साहित करते रहे. जेल की सजा भी काटी. ऐसे आदरणीय व्यक्ति का सानिध्य पाकर मैं कृत्य-कृत्य हो रहा था. मन-मस्तिष्क में अगणित विचार आ-जा रहे थे. जिज्ञासाएं अनन्त थीं. जिज्ञासाओं की श्रेणी में सर्वाधिक उत्तेजित करने वाला प्रकरण जेनरेशन गैप था.
‘जेनरेशन गैप‘ पर मेरे एक अभिन्न मित्र ने शोध किया है. इस विषय पर उनके कई लेख ख्यातिप्राप्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं. मेरे इस मित्र की मान्यता है कि वर्तमान पीढी़ के विचारकों को गत पीढ़ी के लोगों से काफी कुछ मिल सकता है. वह पीढ़ी भूत भोगा है. वर्तमान को देख रहा है और भविष्य की कल्पना से दुःखी हो रहा है. मैं समय नष्ट नही करना चाह रहा था. अस्तु, अपने उद्देश्य की ओर लपका.
‘‘वर्तमान परिवेश में हुए परिवर्तन को क्या महसूस कर रहें हैं‘‘, मेरा सीधा प्रश्न बृजकिशोर बाबू से था.
‘‘किस प्रकार का परिवर्तन ?‘‘
‘‘वही, बहुचर्चित, बहुविचारित, जेनरेशन गैप‘‘
‘‘जेनरेशन गैप अर्थात पीढी़ का अन्तर…….. आज का प्रगतिशील समाज……सब महसूस कर रहा हूँ. भोग रहा हूँ. तड़प रहा हूँ‘‘
बृजकिशोर बाबू के मुख मण्डल पर मेरी बाज-दृष्टि थी. उनके चेहरे पर आ-जा रहे भावों को मैं स्पष्ट महसूस कर रहा था. पढने की कोशिश कर रहा था. कसक, दर्द और विषाद की रेखाएं उनके चेहरे की शांति को भंग कर रही थीं. उनके ताजे घावों पर मरहम लगाने का मैंने असफल प्रयास किया –
‘‘यह जेनरेशन गैप, मामला क्या है ?‘‘
‘जेनरेशन गैप’, क्या बताऊँ भई, देश बंट गया और उसी के साथ हम भी बंट गए. अब तो दो पीढ़ियों के बीच काफी अन्तर आ गया है. विचारों, रहन-सहन, पहनावा, आदरभाव व जीवन की विचार दृष्टि-सब कुछ में अन्तर आ गया है. वर्तमान पीढ़ी ने इस अन्तर को कभी पाटने का प्रयत्न नही किया. समन्वयवादी दृष्टिकोण किसी ने नहीं अपनाया बुढ़ापे पर इस पीढ़ी ने काफी कहर बरसाया है. आज तो वृद्धों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है. पहले ऐसा नही था. पहले कुछ और था. हम नमक-रोटी खाते पर हृदय में कलुष नही था. परिवार संयुक्त ही रहता. पिता के रहते क्या मजाल बेटे अलग हो जांय. सभी एक साथ रहते. सुख दुख बाँटते. बुजुर्ग नाती-पोतों के साथ खेलते. परन्तु अब तो बच्चों को इन बुढ्ढों से पृथक् ही रखा जाता है. बुजुर्गां के विचारों, तथाकथित अप्रगतिशील मान्यताओं, अन्धविश्वास के प्रभाव के डर से. युग बदल गया. लोगों के विचार बदल गए. परिवार का टुकड़ा-टुकड़ा हो गया. बुजुर्गां के सिर पर आरा चला दिया गया. एक खाई बना दी गई, दो पीढ़ियों के बीच. ’
बृजकिशोर बाबू अपनी स्मृतियों को आगे बढ़ाते हैं-
मेरे सामनें की घटना है, बटेसरा के परिवार का उजड़ना. बटेसरा मेरे ही गाँव का एक मध्यम वित्त किसान था. तीन बेटों वाला खुशहाल किसान. विशनाथ, दूधनाथ और शेषनाथ, तीनों ही बेटे मेहनती थे. तीनों एक साथ खाते-पीते और खेत में बटेसरा का हाथ बंटाते. बटेसरा हल चलाता तो विशनाथ हेंगा से मिट्टी फोड़ता तथा बराबर करता. दूधनाथ कुदाल से कोन झाड़ता और शेषनाथ चिखुर फेंकता. बोवनी के समय बटेसरा साफा बाँधता. पीले कपड़े का बडा़ साफा. बैलों का सींग गेरू से रंगता. हल की पूजा करता और तीनों बेटों को लेकर भोर में ही खेत में पहुँचता.
बटेसरा हराई लेता, छोटका शेषनाथ मुठ देता. बेटसरा के हराई के बीच शेषनाथ द्वारा बीज डालने का यह दृश्य देखते बनता था. विशनाथ और दूधनाथ मिट्टी बराबर करते. बडा़ सुख मिलता बटेसरा का. चारों के श्रम से धरती धन उगलती. मौज में कभी-कभी बटेसरा हल चलाते हुए बिरहा गाता. एक कान पर हाथ रखकर तान बढ़ाता. हराई लेते हुए झूम-झूम कर गाता. बटेसरा का बिरहा सुनने काफी लोग इक्कट्ठे हो जाते. जाडे़ की रात में बैठकी होती. कउडा़ बरता. बिठई चारों तरफ रखी जाती. पुआल को ऊँची-ऊँची बिठई पर बडे़-बुजुर्ग बैठते. छोटे बच्चे उसी में दुबककर बैठ जाते. नवजवान भी हाथ सेंकते. किस्से होते. राजा-रानी, रानी सारंगा और हातिमताई के किस्से. बटेसरा किस्सा सुनाता. मगन होकर सुनाता. आँसू बहा-बहाकर सुनाता. बच्चे हुकारी भरते. किस्से की समाप्ति तक अनवरत हूँ-हूँ करते रहते. नींद में भी यह क्रिया अनवरत चलती रहती.
कितना सुखी था बटेसरा. बहुत सुकून मिलता. समय गतिमान रहा. कुछ समय बाद विशनाथ की शादी हुई. ढाई पर गवना हुआ. बहुरिया घर आई. घर में इसी लक्ष्मी की ही तो कमी थी. बचे-खुचे अस्त-व्यस्तता को बहुरिया ने सवांरा. फिर एक दिन दूधनाथ और शेषनाथ भी इस रस्म में नाथ दिये गए. बटेसरा के लिए तो जैसे तीनों लोक का वैभव घर में समा गया हो. चेहरे से प्रसन्नता ऐसे प्रस्फुटित होती जैसे गागर में सागर समाकर छलक रहा हो. बटेसरा अपने भाग्य पर स्वयं इतराता.
बटेसरा के बाल कब सफेद हुए पता ही नही चला. पता भी कैसे चलता. तीन-तीन अप्सराओं से सजा घर. तीन-तीन जवान बेटों के कंधे पर बैठा बटेसरा. कैसे पता चलता कि बाल कब सफेद हुए. परन्तु विधाता ने बटेसरा के सफेद बाल पर कहर बरसा दिया. जब नाती-पोतों के बीच खेलने का अवसर आया तब उसे श्वेत बाल का कड़वा सच पता चला. सुख के बदले दुःख मिला. जब आराम चाहिए था तब कुहराम मिला. ईश्वर भजन के बदले महाभारत का युद्ध देखना पड़ा बटेसरा को.
बटेसरा का संयुक्त परिवार खण्ड-खण्ड हो गया. बटेसरा के तीनों बेटे अलग हो गये. विशनाथ का चूल्हा अलग जलने लगा, दूधनाथ और शेषनाथ का अलग. तीनों बेटे त्रिभुज के तीनों कोणों पर विराजमान हो गए. बटेसरा उनके बीच त्रिशंकु-सा लटक गया. बटेसरा उन्हें मना-मनाकर हार गया, लेकिन उसकी एक न चली. भला उसके जर्जर और धूल चढ़े विचारों पर कौन ध्यान देता ? उन्हे क्या पता कि बटेसरा ने ही ऊँगली पकड़ कर चलाना सिखाया है. दूधनाथ का हाथ तो बटेसरा के गर्दन तक पहुँच गया था. कितना दुःख हुआ होगा, बटेसरा को. जो व्यक्ति अपने बच्चों की मधु-सदृश किलकारी का भूत भोगा हो, वही करेले की कड़वाहट-सा वर्तमान भोगकर कितना व्यथीत हो रहा होगा, इसका गम किसे था. सब अपने में मस्त थे.
खैर, इसके साथ तीनों बेटों में बोलचाल बन्द हो गई. जमीन के तीन टुकड़े हो गए. साझे की खेती बन्द हो गई. बटेसरा का तो जैसे कमर ही टूट गया. उसका पीला साफा तार-तार हो गया.
जायदात के बंटवारे की पंचायत में बहुत लोग इक्कठे हुए थे, उस दिन. तीनों बेटे भी थे. आँचल की ओट में तीनों बहुएं भी थीं. घर उजड़ते हुए देखने वाले भी थे. ताली बजाने वाले भी थे. पंच परमेश्वर भी एकत्र थे. बटेसरा पंचायत में पंचों के पास मुँह लटकाए बैठा था. कुछ लोग बटेसरा को उजड़ते देख मन-ही-मन प्रसन्न थे.
पंचों ने झगडे़ की वस्तुस्थिति सबके सामने रखने को कहा. बटेसरा चुप रहा. बोलता भी क्या ? बोलने लायक तो कुछ भी शेष नहीं था. पंचों ने बटेसरा को दूबारा कुरेदा, परन्तु वह चुप रहा. तीबारा पूछा. लेकिन इस बार भी वह चुप रहा. पंचों ने कई बार पूछा, फिर भी वह चुप ही रहा.
‘‘सब झगड़ा के जर तऽ इ बुढवे बाऽ, इ का बोली‘‘ बड़ी बहू का यह वाक्य पंचायत की खमोशी को तोड़ने के लिए काफी था.
साड़ी का पल्लू गिर गया. बटेसरा की रही-सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो गई. बटेसरा की स्थिति दयनीय हो गयी थी. बावजूद इसके वह चुप ही रहा. वह आँखों में उमड़ते आँसुओं को बार-बार पीने का असफल प्रयत्न कर रहा था.
‘‘हं-हं, इहे तीन गो आँख से देखत बाऽ सबके, इ पगरलेसना काऽ बोली‘‘ बड़की के समर्थन में मझली बोली. बटेसरा पर घड़ो पानी गिर पड़ा. लेकिन वह शांत रहकर पीड़ा को सहता रहा. पगडी़ जलाने तक की यात्रा असह्य होती जा रही थी. इतना कुछ होने पर भी वह चुप था.
शेषनाथ की पत्नी भी चुप न रह सकी. वह भी बटेसरा को पंचों के सामने ही खरी-खोटी सुनाई. आपस में तीनों ने ‘झोंटा नोचौवल‘ की. झोंटा-नोचौवल के क्रम में कैसे अपने ही चीर का हरण उन्होंने किया, इसका उन्हें पता ही नही चला. इक्कठे लोग ताली बजा-बजाकर मजा ले रहे थे. द्रोपदी द्वारा द्रोपदी के चीर-हरण का आधुनिक संस्करण जो उन्हें दिखाई दे रहा था. और तीनों भाई मुँह लटकाए बैठे थे.

पंचो के सामने बहुत बडी़ समस्या थी. कोई समझौते के लिए तैयार नही था.विशनाथ, दूधनाथ और शेषनाथ तीनों अलग होना चाहते थे. पंचों ने हारकर उनके मनोनुकूल फैसला किया. तीनों भाइयों को अलग-अलग कर दिया गया. घर में भी तीन हिस्सा लगा. खून के तीन हिस्से हो गए.
तीनों बेटे तो अलग हो गए, परन्तु बटेसरा कहाँ जाता. पंचों ने उसके लिए ‘जीयन‘ निकालनी चाही. परन्तु वह जमीन का एक छोटा टुकड़ा लेकर क्या करता ? कौन मुठ लेता ? ढे़ला कौन फोड़ता ? किसे वह बिरहा सुनाता. वह ‘जीयन‘ लेने से साफ मना कर दिया. पंचों ने तब एक-एक दिन तीनों बेटों के यहाँ बटेसरा को रहने की बात रखी. बटेसरा का जैसे तीन टुकड़ा पंचों ने कर दिया. फिर भी बटेसरा मान गया. उसने मौन स्वीकृति दे दी. कम से कम बच्चों के साथ रहने का अदृश्य सुख तो मिलेगा. यही वह सोच रहा था. पंचायत की कार्यवाही समाप्त कर दी गई. लोग अपने-अपने घर चले गए. यह काण्ड गांव के कोने-कोने में जंगल की आग की तरह फैल गई.
बटेसरा के यहाँ उस दिन से तीन चूल्हे जलने लगे. बटेसरा एक दिन विशनाथ के यहाँ खाता, एक दिन दूधनाथ और एक दिन शेषनाथ के यहाँ. बुढ़ापे में रोज ही झपलाया जाता. बड़की झपलाती, मझली भी वही करती और छोटकी कोसती. ‘मुअतो नइखे इ बुढ़वा‘ जैसे रोज का सूत्र वाक्य बन गया था. बटेसरा रोज मरता. न चैन से खाता, न चैन से सोता. हाँ, अपने बेटों की उपेक्षा का शिकार रोज होता. कोई परूआ बैल कहता, कोई कुछ कहता. बटेसरा सब कुछ सुनता, लेकिन चुप ही रहता. चुप रहना उसकी नियति बन गई थी. ऐसे ही में एक दिन वह सदा के लिए चुप हो गया. टैक्सी भी रूक गई. ट्यूब पंचर हो गया था. बृजकिशोर बाबू को पास ही कहीं जाना था. इस कारण टैक्सी से वह उतर गए. पैदल ही शेष यात्रा पूरी कर लेना उन्होने श्रेयस्कर समझा था.
‘‘आम-जैसी गंभीरता है आपमें‘‘ विदा होते बृजकिशोर बाबू बोले.
‘‘परन्तु जेनरेशन गैप‘‘ अचानक मेरे मुँह से निकला और हम दोनो एक साथ मुस्कराए.
‘‘आपको तो और भी आगे जाना है ?‘‘
‘‘हाँ, परन्तु टैक्सी की मरम्मत में कुछ समय तो लगेगा ही.‘‘
‘‘क्या कीजिएगा, इतनी प्रगति के बावजूद यह पम्पिंग सेट की मशीन से जुगाड़ तकनीक के प्रयोग से चलित यह टैक्सी‘‘
‘‘यदि यह टैक्सी नहीं होती तो पूर्व पीढ़ी की स्थिति का आंकलन कैसे होता और जेनरेशन गैप का क्या होता ?‘‘

विगत की स्मृतियों और वर्तमान की पीड़ा के साथ बृजकिशोर बाबू आँखों से ओझल हो गए थे.

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