Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
4 Oct 2016 · 7 min read

“ नदिया पार हिंडोलना ” [ दोहा-शतक ] +रमेशराज

कबिरा माला कौ नहीं, अब रिश्वत कौ जोर
कर पकरै, अँगुरी गिनै, धन पाबै चहुँ ओर । 1

कबिरा आज समाज में ढोंग बना टेलेंट
मृग की कुण्डलि में बसै कस्तूरी कौ सेंट। 2

भगतु सँवारी कामियाँ इन्द्रिन कौ लै स्वाद
भक्ति हो गयी काममय जाकौ अन्त न आद। 3

भोग-चढ़ावा राम पै मोकूँ लागै मीठ
मैं का जानूँ राम कूँ नैनूँ कबहू न दीठि। 4

+जाति-धर्म के नाम पै कबिरा हिन्सा होय
ढाई आखर प्रेम कौ आजु न सीखै कोय। 5

+सब इन्द्रिय सुख भोगते साधु -संत या ऊझ
कौनु मरै मैदान में अब इन्द्रिन सूँ जूझ। 6

+तस्कर अब गुरुवर भये कबिरा कौ गहि ज्ञान
काम क्रोध तृष्णा जिन्हें आज बने भगवान। 7

संतु विदेशी चैक लखि रखै सँजोय-सँजोय
मन मथुरा, दिल द्वारिका, काया काशी होय। 8

+दीन-धर्म के नाम पर कबिरा हिन्सा भाय
हिन्दू मारै राम कहि, मुस्लिम बोल खुदाय। 9

+कबिरा गुरु या साधु से कहा सीखिए ज्ञान
सब कुर्सी के लालची, सब सत्ता का स्वान। 10

साधू सोचै स्वयम् कूँ गद्दी पर बैठारि-
‘स्वान रूप संसार है भौंकन दै झकमारि’। 11

ऊपर-ऊपर ही रह्यौ कबिरा सबकौ ध्यान
को देखै तलवार कूँ जब सोने की म्यान। 12

कबिरा अब तौ साधु को हरि-रस है बेकार
सत्ता-रस ऐसौ पियै कबहू न जाय खुमार। 13

संत कमंडल भरि लयी छल-फरेब की खीर
मन से ठगई लूट की मिटै न प्यास कबीर। 14

कबिरा आप ठगाइये बदल गयी यह रीति
मक्कारी जग में बनी सुख की आज प्रतीति। 15

आब मिलै-आदर मिलै, पावै अति सत्कार
मनुज लूट की सम्पदा दान-पुण्य कछु डार। 16

निन्दक नियरे का रखें आँगन कुटी छबाय
अब परिजन ज्यों कोयला तुरत दाग दै जाय। 17

आज बोलते सभ्य-जन विष में शब्द भिगोय
खुद को शीतलता मिलै और न शीतल होय। 18

दुष्ट न छोड़ै दुष्टता भले जताऔ नेह
सूखा काठ न जानही कबहू बूठा मेह। 19

ऊँचे कुल कूँ छोडि़ए सब बातें बेकार
ऊँचे पद के कारणे बंस बँधा अधिकार। 20

इतनौ सौ कबिरा रह्यौ अर्थ प्रेम कौ आज
शीश उतारें हम नहीं, सिर्फ उतारें लाज। 21

लोग सराहें, हों भले गंधहीन-गुणहीन
कहें धतूरे को कमल माया के आधीन। 22

मुख पर आये मित्र के कई अजनबी रंग
काम पड्या यूँ छाँड़सी ज्यों कैंचुली भुजंग। 23

जहर घुला-पानी मिला दूध बिके बाजार
तृषावंत जो होइगा पीयेगा झकमार। 24

कबिरा जे जो सुन्दरी जाणि करौ व्यभिचार
घर लाबत धन देखिकैं खुश होवैं भरतार। 25

जाहि झुकावैं शीश हम, वो ही माँगे सीस
का मन कूँ मैदा करें कबिरा अब हम पीस। 26

कबिरा अब अखबार में चुटकी-भर सच नाहिं
राई कूँ पर्बत करें, पर्बत राई माहिं। 27

कबिरा आज सगेनु सों द्वन्द्व-युद्ध नित होय
परनारी भ्राता-पिता अपनावै हर कोय। 28

सम्पत्ति जन की लूटकर मानत है मन मोद
मुल्क चबैना सेठ का कछु मुँह में-कछु गोद। 29

घर जालौ, घर ऊबरौ, घर असीम धन आय
एक अचम्भा जग भयौ घर कौ बीमा पाय। 30

माया दीपक नर पतँग संकट नहीं पडंत
रिश्वतखोरी में फँसें, रिश्वत दै उबरंत। 31

स्वामी सेवक एकमत, कौन इन्हें हड़काय
बिन रिश्वत रीझें नहीं, रीझें रिश्वत पाय। 32

कबिरा ये जग हो भले छिन खारा, छिन मीठ
मान और अपमान तजि मजा लूटते डीठ। 33

चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय
आज विश्वबाजार में साबुत बचा न कोय। 34

कथित राम के राज खुश सत्ता के सुग्रीव
रुखी-सूखी हू छिनी भूखे सोवैं जीव। 35

घोटाले नेता फँस्यौ जब सत्ता-पद खोय
तम्बोली के पान-सौ दिन-दिन पीलौ होय। 36

चोर-उचक्के बन गये नेताजी के खास
जो जाही को भावता सो ताही के पास। 37

मसि कागद छूए न जो, कलम गहे नहिं हाथ
शिक्षामंत्री बन गये पद-गौरव के साथ। 38

चोर उचक्के गिरहकट तस्कर मालामाल
लाली आज दलाल की जित देखौ तित लाल। 39

रामराज्य छल ही रह्यौ, केवल सत्ता भाय
पाणी ही ते हिम भया, हिम है गया बिलाय। 40

नेता अफसर धनिकजन भेजें पूत सिहाय
नदिया पार हिंडोलना अमरीका कौ भाय। 41

कबिरा लहर समन्द की मोती बिखरे आय
नयी आर्थिक नीति पर हर दलाल हरषाय। 42

अमरीका की नीति को रोज नबावै माथ
काया विहँसै हंस की पड्या बगाँ के साथ। 43

नेता पक्ष-विपक्ष के सब सत्ता के भूप
जिनके मुँह-माथा नहीं और न कोई रूप। 44

मंत्री आबत देखकर साधुन करी पुकार
‘हम फूले हमकूँ चुनौ संसद में सरकार’। 45

मंत्री और दलाल सँग चमचा शोभित होय

तीन सनेहू बहु मिलें, चौथे मिलै न कोय। 46
आदि-अन्त सब सोधियाँ कबिरा सुनि यह काल
पद-कुर्सी ही सार है और सकल जंजाल। 47

विश्वबैंक अमृत चुबै पावै कमल प्रकास
अमरीका की बन्दगी करते डॉलर-दास। 48

सतगुरु रीझि तहल्लका बोलौ एक प्रसंग
‘डालर ला, मैं बेच दूँ भारत कौ अँग-अंग’। 49

सत्तापक्ष-विपक्ष कौ जन समझे नहिं सार
गुरु-गोबिन्द तो एक हैं दूजा यह आकार। 50

हंसों को लगते भले उल्लू के हुड़दंग
सुन रहीम अब तौ निभै बेर-केर कौ संग। 51

रहिमन ये नर और सों माँगन कछू न जायँ
भगवा-वसनी लूटकर ऐश करें गरबायँ। 52

रहिमन बिपदा हू भली जो थोड़े दिन होय
मजा लूट का उम्र-भर, सजा न देखे कोय। 53

सुन रहीम मँडरात अब सत्ता के जिन-प्रेत
गिद्ध गहत निर्जीव कह, बाज सजीव समेत। 54

सम्पति लूटन में सगे बने सेठ बहुरीति
मल्टीनेशन से बढ़ी आज स्वदेशी प्रीति। 55

आज धर्म के नाम पर बधिक प्राण यूँ लेत
मृग जैसे मृदुनाद पर रीझि-रिझि तन देत। 56

इनकूँ कितनौ हू मिलै सुनि चंदन को संग
पर रहीम बदलें नहीं, रहें भुजंग, भुजंग। 57

कहा सराहें प्रीति के स्वारथमय मजमून
बिन पानी सुर्खी कहाँ पावें हल्दी-चून। 58

घडि़याली आँसू बहा नेता पल में देई
रहिमन अँसुआ नैन ढरि अब छल प्रकट करेई। 59

सज्जन के भ्रम में यहाँ ठगे जात हर बार
रहिमन अब का पोइये टूटे मुक्ताहार। 60

जब तक सत्ता साथ है तब तक मद से छोह
जाल-परे जल जातु बहि तजि मीनन कौ मोह। 61

न्याय आज अन्याय कौ छुप-छुप माखन खाय
मुंसिफ चोर-डकैत को भीर परे ठहराय। 62

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान
तरुवर-सरवर कौ करें दोहन चतुर सुजान। 63

धन पर रीझे डाक्टर आवत देखि अपार
रहिमन गहै बड़ेन कूँ लघुन बरांडे डार। 64

नोचें लाशें न्याय की महाभोज-सौ होत
गिद्धन में भारी खुशी बढ़त देखि निज गोत। 65

स्वारथ देखे स्वारथी हर पल बदी सुहाय
रहिमन धागौ प्रेम को तुरत देतु चटकाय। 66

रहिमन ओछौ नर तुरत ओछे कूँ गहि लेतु
जब भी चाटै मैम कूँ स्वान बहुत सुख देतु। 67

जो चिपकौ है लौन-सौ ईंट-ईंट बन रेह
बाहि निकारौ गेह ते भले भेद कहि देह। 68

रहिला-मैदा काहु की ले जूठन हरषाय
रहिमन मन मैला नहीं, जा नर भीख सुहाय। 69

फँसे तहलका में कई अब का राखें गोय
सुनि अठिलैहें लोग सब, जगत हँसाई होय। 70

मेरी भव बाधा हरौ राधा नागर सोय
भगतु कहै अब जगत की मिलै सम्पदा मोय। 71

आज विरागी बोलतौ-‘प्रभु लाऔ तर-माल
इहि बानक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल’। 72

कहै भगतु लखि उर्वशी-‘इसको छोडूँ मैं न’
हरि नीके नैनानु तैं हरिनी के शुभ नैन। 73

चटक न छाँड़त घटत हू ऐसौ नेहु गँभीरु
फीकौ पड़ै न गेरुआ रँग्यौ मोह को चीरु। 74

यही आधुनिक धर्म है, यह युग की पहचान
बसै बुराई जासु तन, ता ही कौ सम्मान। 75

अब नर तजि आदर्श कूँ, हर मर्यादा खोय
जै तो नीचै ह्वै चलै, तै तौ ऊंचौ होय। 76

नीच करम से पाय धन नर बेहद गरवाय
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिलु मन सरोज बढि़ जाय। 77

बुरी बात चाहे बँधे यति गति लय तुक छंद
राखौ मेल कपूर में हींग न होय सुगंध। 78

ये जग काँचै काँच-सौ, मैं समझौ निरधार
अब जान्यौ बस दाम ते सकल ठोस संसार। 79

ठग-डकैत-बदकार पर जन विश्वास न आत
बुरौ बुराई जो तजै तौ चित खरौ डरात। 80

अवगुन चीन्है और में अपने अवगुन नाहिं
ज्यों आँखिन सब देखिए आँख न देखी जाहिं। 81

कहत नटत रीझत खिजत मिलत खिलत लजियात
नारी को अब पुरुष की भारी जेब सुहात। 82

बड़े है गये गुनन बिन मूरख इस युग आय
कहतु धतूरौ-‘मैं कनक, गहनौ लेउ गढ़ाय’। 83

भले बहू हो कर्कशा मन में हो छल-छंद
घर में लाय दहेज बहु काहि न करत अनंद। 84

अबला बधु को यूँ दिखें आज सास औ’ नंद
अधिक अँधेरौ ज्यों करत मिलि मावस रवि-चंद। 85

चोर लुटेरे ठग चलें सबै बनावन मित्त
रज-राजसहिं छुबाइकैं नेह चीकने चित्त। 86

आज स्वदेशी रूप में बसी विदेशी गंध
संगति सुमति न पाबही परे कुमति के धंध । 87

दुसह दुराज प्रजान कौं क्यों न बढ़ै दुख-द्वन्द
गद्दी पर बैठे यहाँ अन्धे औ’ मति-मंद।

सत्ता तक लायी उन्हें, राम-राज की सोधि
पाहन नाव चढ़ाई जिहिं कीने पार पयोधि | 89

विश्वबैंक कौ सूर्य जब चमकौ भारत माहिं
देखि दुपहरी जेठ की छाहौ चाहति छाँहि। 90

अधर धरत नेतहिं परत ओठ डीटि पट ज्योति
विश्व बैंक की बाँसुरी इन्द्रधनुष रँग होति। 91

अपने कुल कौ जानि कैं नृपवर प्रखर प्रवीन
अमरीका की गोद में झट भारत धरि दीन। 92

काँगरेस अरु भाजपा खिले एक ही डाल
‘आजु मिले सु भली करी’ कहते फिरें दलाल। 93

नहिं पराग नहिं मधुर मधु , नहिं विकास यह काल
आज उदारीकरण में सूख गयी हर डाल। 94

या सत्ताई चित्त की गति समझै नहिं कोय
नये करों के बोझ से चित्त करै खुश होय। 95

जन में बढ़ै विलासता, मादकता औ’ भोग
क्यों न दबावै तब उन्हें पापी-राजा-रोग। 96

अहंकार अफसर लखें, रहें सबै गहि मौन
पद को करें सलाम सब, अवगुन देखै कौन। 97

मन में इसके चाह थी मिलै कमल-सी आब
फूल्यौ अनफूल्यौ भयौ कीचड़ माहिं गुलाब। 98
अलग-अलग दल हों भले, सब सत्ता के घाघ
संसद में एकहिं लखत अहि मयूर मृग बाघ। 99

कुर्सी से अफसर नहीं गाल चीकने कोय
ज्यौं-ज्यों बूढ़े पद सहित त्यों-त्यों थुलथुल होय। 100

सोहत ओढ़े पीत पट आज सलौने गात
विश्व बैंक के कर्ज से लावन जुटे प्रभात। 101

अंकल चिप्सन खाय कैं पीकर मिनरल नीर
मंद-मंद संसद चल्यौ कुंजर ‘गैट’ समीर। 102

एक फस्यौ बोफोर्स में, एक तहलका जान
सत्ता पक्ष-विपक्ष में रह्यौ भेद नहिं आन। 103

गहरी नींद-अफीम सौं जिस दिन जगे अवाम
जप माला छापा तिलक सरै न एकौ काम। 104
+रमेशराज
——————————————————–
रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-२०२००१
मो.-९६३४५५१६३०

Language: Hindi
640 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
You may also like:
ਪਰਦੇਸ
ਪਰਦੇਸ
Surinder blackpen
जीवन की सुरुआत और जीवन का अंत
जीवन की सुरुआत और जीवन का अंत
Rituraj shivem verma
वक़्त होता
वक़्त होता
Dr fauzia Naseem shad
बेजुबान तस्वीर
बेजुबान तस्वीर
Neelam Sharma
मातृभाषा हिन्दी
मातृभाषा हिन्दी
डॉ०छोटेलाल सिंह 'मनमीत'
कैसे हमसे प्यार करोगे
कैसे हमसे प्यार करोगे
KAVI BHOLE PRASAD NEMA CHANCHAL
*ओ मच्छर ओ मक्खी कब, छोड़ोगे जान हमारी【 हास्य गीत】*
*ओ मच्छर ओ मक्खी कब, छोड़ोगे जान हमारी【 हास्य गीत】*
Ravi Prakash
उलझ नहीं पाते
उलझ नहीं पाते
अभिषेक पाण्डेय 'अभि ’
जिस प्रकार लोहे को सांचे में ढालने पर उसका  आकार बदल  जाता ह
जिस प्रकार लोहे को सांचे में ढालने पर उसका आकार बदल जाता ह
Jitendra kumar
प्रकृति की गोद खेल रहे हैं प्राणी
प्रकृति की गोद खेल रहे हैं प्राणी
तारकेश्‍वर प्रसाद तरुण
शेर बेशक़ सुना रही हूँ मैं
शेर बेशक़ सुना रही हूँ मैं
Shweta Soni
विचार
विचार
अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'
आँखें दरिया-सागर-झील नहीं,
आँखें दरिया-सागर-झील नहीं,
महावीर उत्तरांचली • Mahavir Uttranchali
"आलिंगन"
Dr. Kishan tandon kranti
बेटियां
बेटियां
Nanki Patre
कुछ अजीब सा चल रहा है ये वक़्त का सफ़र,
कुछ अजीब सा चल रहा है ये वक़्त का सफ़र,
Shivam Sharma
गज़ल सी कविता
गज़ल सी कविता
Kanchan Khanna
राम
राम
umesh mehra
बावरी
बावरी
पंकज पाण्डेय सावर्ण्य
♥️राधे कृष्णा ♥️
♥️राधे कृष्णा ♥️
Vandna thakur
साधक
साधक
सतीश तिवारी 'सरस'
हमारे पास हार मानने के सभी कारण थे, लेकिन फिर भी हमने एक-दूस
हमारे पास हार मानने के सभी कारण थे, लेकिन फिर भी हमने एक-दूस
पूर्वार्थ
शिक्षक हूँ  शिक्षक ही रहूँगा
शिक्षक हूँ शिक्षक ही रहूँगा
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
Dr Arun Kumar shastri
Dr Arun Kumar shastri
DR ARUN KUMAR SHASTRI
खुशी के पल
खुशी के पल
RAKESH RAKESH
रिश्ते
रिश्ते
Punam Pande
मुक्तक
मुक्तक
दुष्यन्त 'बाबा'
खंड काव्य लिखने के महारथी तो हो सकते हैं,
खंड काव्य लिखने के महारथी तो हो सकते हैं,
DrLakshman Jha Parimal
"चैन से इस दौर में बस वो जिए।
*Author प्रणय प्रभात*
इश्क का रंग मेहंदी की तरह होता है धीरे - धीरे दिल और दिमाग प
इश्क का रंग मेहंदी की तरह होता है धीरे - धीरे दिल और दिमाग प
Rj Anand Prajapati
Loading...