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जैसा करम करेगा

मुझे खूब याद है जब मैं इस घर में पहली बार आयी थी| बड़े-बड़े साफ़ साफ़ कमरे, सुंदर-सुंदर चीज़ें सजी हुई, मेरे बराबर के दो बच्चे खेलते हुए – राहुल और प्रियंका| इन दोनों के पास कितने सारे खिलौने थे| ऐसे खिलोने तो मैंने दुकान में शीशे के अन्दर सजे हुए ही देखे थे । मैं बहुत सहमी सी थी| मेरी मम्मी ने यहाँ बर्तन व सफाई का नया-नया काम पकड़ा था| सो इतवार को वे अपने साथ मुझे भी लिवा लायी थी| मैं मम्मी के साथ–साथ घूम रही थी| तभी एक सुंदर सी मेमसाब आईंऔर मुझे एक खिलौना देकर बोलीं “लो इस से खेल लो|” मम्मी ने बताया कि वह हमारी मालकिन थीं। उनकी आवाज बड़ी मीठी थी| और मालिक की आवाज बड़ी कड़क थी| मुझे उनसे बड़ा डर लगा| पर जब बाद में उन्होंने मुझसे प्यार से बात की तो धीरे-धीरे मेरा डर भी कम हो गया|
मेरी मम्मी को इस घर से बहुत सामान मिलता| खाने की अच्छी– अच्छी चीजें मिलतीं । कभी कभी फल भी मिलते| मालकिन इतने अच्छे कपडे देतीं कि हम सब भाई बहन बड़े शौक़ से उन्हें पहनते । कभी कभी तो थोड़े छोटे या थोड़े बड़े कपडे भी हम लोग पहन लेते क्योंकि हमें उन्हें पाकर ऐसी ख़ुशी होती थी जैसे वे नए कपडे हों। मालिक के बच्चे राहुल और प्रियंका हमेशा नए – नए कपड़ेे पहनते| वो नए-नए खिलौनों से खेलते और जब उनका मन भर जाता तो वे उनसे खेलना बंद कर देते, तब मालकिन ऐसे कुछ खिलौने हमें भी दे देतीं। मुझे उनके घर जाना बहुत अच्छा लगता था| मैं हर छुट्टी के दिन काम करने के बहाने मम्मी के साथ आती और देखती कि राहुल और प्रियंका की हर जिद पूरी की जाती थी|
मालिक ने मम्मी से कहकर हमें सरकारी स्कूल से निकलवा कर अपने किसी दोस्त के स्कूल में दाखिला दिलवा दिया था| हम चार भाई बहिनों में से दो की फीस मालिक अपने पास से भरते थे|
मालिक बड़े आदमी थे| उनका बड़ा रुतबा था| मालकिन भी उनकी खूब सेवा करती थी| कभी-कभी राहुल कहता कि “मम्मी, आपको काम करने की क्या जरुरत है?” आप सारे कामों के लिए कामवाली बाई रख लो| फिर सारे दिन हमारे साथ खेला करो| तो मालकिन हँस कर कहतीं– “जब तू बड़ा होगा और तेरी शादी हो जाएगी न तब तू खूब सारे नौकर रखना और सारे काम उनसे करा लेना| मैं और तेरे पापा बस तेरे बच्चों को खिलाया करेंगे| पर सब कुछ वैसा नहीं होता, जैसा हम सोचते हैं। होनी को कुछ और ही मंजूर था|
बहुत साल बाद जब मैं शादी होकर ससुराल चाली गयी, तो इस घर की बहुत सारी यादेंअपने साथ ले गयी, मेरा आदमी एक फैक्ट्री में काम करता था और हम दोनों की जिन्दगी अपने तीन बच्चों के साथ ठीक चल रही थी| पर अचानक जाने क्या हुआ कि वह फैक्ट्री ही बंद हो गयी| मेरा आदमी बेरोजगार हो गया| जिंदगी में मुसीबतें ही मुसीबतें नज़र आने लगीं । मैं कह सुनकर अपने आदमी और बच्चों को मायके ले आई| राहुल अब एक फैक्ट्री का मालिक था| मम्मी ने मेरे आदमी को वहाँ नौकरी दिलवा दी| नया नया काम था| अभी मेरा आदमी सीख रहा था इसलिए तनख्वाह बहुत कम मिल रही थी| घर का गुजारा इतने में नहीं हो सकता था, इसलिए मेरी मम्मी ने मालिक के घर का काम मुझे दे दिया| अब राहुल मेरा ‘छोटा मालिक’ बन गया था और उसकी पत्नी मेरी ‘छोटी मालकिन’| मम्मी के पास आकर मैंने जो कुछ इस घर के बारे में सुना वह किसी फिल्म की कहानी जैसा था| मालिक अपने नीचे काम करने वालों के साथ बड़ी नरमी से पेश आते थे| वे सबको अपने जैसा साफ़ दिल समझते थे| वे बहुत बड़े अफसर थे । सुना है कि उन्हें उनके मातहत काम करने वाले अफसर ने बड़ा धोखा दिया| जब सारी बात खुली तो मालिक के कुछ दोस्तों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन इस धोखेबाज आदमी ने मालिक के सीधेपन और विश्वास का फायदा उठाकर उनसे कुछ ऐसे कागज साईन करा लिए थे कि जो उस गुनाह के सबूत बन गए जो गुनाह मालिक के किया ही नहीं था| कोर्ट – कचहरी के चक्कर लगाकर भी मालिक की बेगुनाही साबित नहीं हो सकी| अपने मातहत साथी की गद्द्दरी ने मालिक को अंदर तक तोड़ दिया| उन्हें दिल का दौरा पड़ा| कुछ दिन बाद उन्हें अस्पताल से तो छुट्टी मिली लेकिन मुसीबतों से नहीं| मालकिन जो हमेशा हँसती रहती थीं, वे दुःख में ऐसी डूबीं कि उससे उबर ही नहीं सकीं। जीतेजी अपने पति का हर कदम पर साथ निभाने वाली मालकिन उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अकेला छोड़ गयीं । मालिक के दामन पर जो दाग उस आदमी ने लगाया, उस पर भले ही ऑफिस के बहुत से लोगों ने यकीन नहीं किया, लेकिन वह दाग मालिक के जीवन के सारे रंग छीन ले गया| छोड़ गया ऐसी बदरंग जिंदगी जिसे देखकर मेरा मन भी रो पड़ा|
आज यह घर ‘राहुल साब’ का है| घर में मेमसाहब की हुकूमत चलती है| मालिक-मालकिन ने इस घर को बड़े जतन से सजाया था| मेमसाहब यानी छोटी मालकिन ने घर की ढेरों पुरानी चीजें कबाड़ी के हाथों बेच दीं | पीतल का ढेरों सामान बिका और सारा पैसा छोटी मालकिन अपनी अलमारी में रखती चली गयीं । वे नए जमाने की लड़की हैं, उन्हें भला पुरानी चीजें क्यों भाएँगी? एक दिन मैंने उन्हें छोटे मालिक से कहते सुना कि वे घर की सारी चाँदी की चीजें इकटठी करके सर्राफा बाजार में बेच आई हैं और चाँदी का बेहद खूबसूरत ताजमहल खरीद कर लाई हैं। उसे उन्होंने अपने बेडरूम में सजाया है| बेड के पीछे एक छोटे से शोकेस में दूधिया बल्बों की रोशनी में ताजमहल ऐसा जगमगाता जैसा शायद छोटी मालकिन के एल० सी० डी० में सचमुच का ताजमहल भी नहीं जगमगाता होगा| पर यह ताजमहल किसके अरमानों की कब्र पर बना, यह जानने की किसी को न फुर्सत थी और न जरुरत|
इसके बाद मुझे मालिक के कमरे वे चाँदी के गिलास कभी नहीं दिखे, जिन्हें वे पानी पीने के लिए रखते थे| मालिक-मालकिन की शादी का एक फोटो चाँदी के भारी से फ्रेम में जड़ा हुआ मालिक के कमरे में सजा हुआ रहता था| अब उसकी जगह बस वह फोटो ही रह गया था, बिना फ्रेम वाला|
बहुत पहले जब मालिक घर आते थे, तब राहुल दौड़कर उनकी गोद में चढ़ जाता था और अपनी फरमाइशी चीज़ लेकर ही मानता था । किसी दिन उसकी चीज़ न आ पाए तो रो-रोकर सारा घर सिर पर उठा लेता था| और अब…….. अब जब छोटे मालिक घर आते तो बड़े मालिक अगर सामने खड़े भी हों, तो छोटे मालिक उन्हें अनदेखा करके, सीधे छोटी मालकिन के पास चले जाते| बड़े मालिक तो बस नाम के मालिक थे| मुझे नौकर होकर भी उनके ऊपर तरस आता था पर छोटे मालिक को कभी इन बातों का ख़याल न आता| शायद वे अपने पिता को अपने घर में रखकर उनके रोटी-पानी और दवा-दारू पर खर्च करके यही समझते कि वे अपनी जिम्मेदारी बहुत अच्छी तरह निभा रहे है| क्योंकि एक दिन प्रियंका दीदी अपने पति के साथ यहाँ आई थीं और उन्होंने बड़े मालिक को अपने साथ ले जाने की बात कही थी, तो छोटे मालिक एकदम से बिफर पड़े थे|
“क्यों ले जाओगी पापा को अपने साथ? दुनिया के सामने हमें बदनाम करोगी! क्या कमी है इन्हें यहाँ! उन्हें रोटी नहीं मिलती या उनकी बीमारी का इलाज नहीं होता| उन्होंने तो हमें कुछ दिया भी नहीं है| जो कमाया था, गॅवा दिया| फिर भी हमने अपने कर्तव्य को निभाया है| प्रियंका दीदी उलटे पैर चली गयीं, भारी मन से|
बड़े मालिक के कुछ दोस्त पहले आते थे| पर छोटी मालकिन के रूखे व्यवहार को देखकर धीरे-धीरे उन्होंने भी आना छोड़ दिया| मैं यहाँ रोज रोज आती हूँ| सुबह से शाम तक सारे काम करती हूँ और ढलते सूरज के साथ मालिक की ढलती जिंदगी को देखती-देखती चली जाती हूँ अपने घर| मालिक ने हमारे लिए बहुत कुछ किया, पर मैं उनके लिए कुछ भी नहीं कर सकती| आज जब घर पहुंची, तो वहां काले-सफ़ेद टीवी पर यह गाना आ रहा था-
“जैसा करम करेगा, वैसा फल देगा भगवान्,
यह है गीता का ज्ञान
यह है गीता का ज्ञान

मैंने चिढ़कर टीवी
बंद कर दिया|”

लेखिका-
संध्या गोयल ‘सुगम्या’

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