Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
19 Apr 2018 · 2 min read

छंद ‘दोहा’ व उसका रचनाक्रम : इंजी. अम्बरीष श्रीवास्तव ‘अम्बर’

दोहे के माध्यम से दोहे की परिभाषा :-

(छंद दोहा : अर्धसम मात्रिक छंद, चार चरण, विषम चरण तेरह मात्रा, सम चरण ग्यारह मात्रा, अंत पताका अर्थात गुरु लघु से, विषम के आदि में जगण वर्जित, प्रकार तेईस)

तेरह ग्यारह क्रम रहे, मात्राओं का रूप|
चार चरण का अर्धसम, शोभा दिव्य अनूप||

विषम आदि वर्जित जगण, सबसे इसकी प्रीति|
गुरु-लघु अंतहिं सम चरण, दोहे की यह रीति||

विषम चरण के अंत में, चार गणों को त्याग|
यगण मगण वर्जित तगण, भंग जगण से राग||

–अम्बरीष श्रीवास्तव

दोहा चार चरणों से युक्त एक अर्धसम मात्रिक छंद है जिसके पहले व तीसरे चरण में १३, १३ मात्राएँ तथा दूसरे व चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं, दोहे के सम चरणों का अंत ‘पताका’ अर्थात गुरु लघु से होता है तथा इसके विषम चरणों के प्रारंभ में स्वतंत्र जगण अर्थात १२१ का प्रयोग वर्जित है तथा दोहे के विषम चरणों के अंत में यगण(यमाता १२२) मगण (मातारा २२२) तगण (ताराज २२१) व जगण (जभान १२१) का प्रयोग त्याज्य जबकि वहाँ पर सगण (सलगा ११२) , रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती है

जबकि इसके सम चरणों के अंत में जगण अथवा तगण आना चाहिए अर्थात अंत में पताका (गुरु लघु) अनिवार्य है|

निश्छल निर्मल मन रहे, विनयशील विद्वान्!
सरस्वती स्वर साधना, दे अंतस सद्ज्ञान!!

छंद सहज धुन में रचें, जाँचें मात्रा भार!
है आवश्यक गेयता, यही बने आधार !!

दोहे का आन्तरिक रचनाक्रम

तीन तीन दो तीन दो, चार चार धन तीन! (विषम कलात्मक प्रारंभ अर्थात प्रारंभ में त्रिकल)
चार चार धन तीन दो, तीन तीन दो तीन!! (सम कलात्मक प्रारंभ अर्थात प्रारंभ में द्विकल या चौकल)
(संकेत : दो=द्विकल, तीन=त्रिकल, चार= चौकल)
__________________________________________

(अ) तीन तीन दो तीन दो : (चौथे त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ वर्जित)
(१) ‘राम राम गा(व भा)ई’ (चौथे त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ होने से गेयता बाधित)
(२) ‘राम राम गा(वहु स)दा’ (चौथे त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ न होने के कारण सहज गेय)
(ब) चार चार धन तीन दो : (त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ वर्जित)
(१) ‘सीता सीता पती को’ (त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ होने से गेयता बाधित)
(२) ‘सीता सीता नाथ को’ (त्रिकल समूह में लघु-गुरु अर्थात १२ न होने के कारण सहज गेय)
(उपरोक्त दोनों उदाहरण ‘अ’ तथा ‘ब’ छंद प्रभाकर से लिए गए हैं |)

निम्नलिखित को भी देखें…

दम्भ न करिए कभी भी (चरणान्त में यगण से लयभंग) / दंभ नहीं करिए कभी (चरणान्त में रगण से उत्तम गेयता)
हार मानिए हठी से (चरणान्त में यगण से लयभंग)/ मान हठी से हार लें (चरणान्त में रगण से उत्तम गेयता)
दोहे की रचना करते समय पहले इसे गाकर ही रचना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! इसमें गेयता का होना अनिवार्य है ! दोहे के तेईस प्रकार होते हैं | जिनका वर्णन बाद में किया जाएगा |

–इं० अम्बरीष श्रीवास्तव ‘अम्बर’

Language: Hindi
Tag: लेख
417 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
You may also like:
*आत्महत्या*
*आत्महत्या*
आकांक्षा राय
आसान नही सिर्फ सुनके किसी का किरदार आंकना
आसान नही सिर्फ सुनके किसी का किरदार आंकना
Kumar lalit
करते हो क्यों प्यार अब हमसे तुम
करते हो क्यों प्यार अब हमसे तुम
gurudeenverma198
मोहब्बत का वो तोहफ़ा मैंने संभाल कर रखा है
मोहब्बत का वो तोहफ़ा मैंने संभाल कर रखा है
Rekha khichi
रमेशराज के विरोधरस दोहे
रमेशराज के विरोधरस दोहे
कवि रमेशराज
सब कुछ पा लेने की इच्छा ही तृष्णा है और कृपापात्र प्राणी ईश्
सब कुछ पा लेने की इच्छा ही तृष्णा है और कृपापात्र प्राणी ईश्
Sanjay ' शून्य'
बोलते हैं जैसे सारी सृष्टि भगवान चलाते हैं ना वैसे एक पूरा प
बोलते हैं जैसे सारी सृष्टि भगवान चलाते हैं ना वैसे एक पूरा प
Vandna thakur
मन चंगा तो कठौती में गंगा / MUSAFIR BAITHA
मन चंगा तो कठौती में गंगा / MUSAFIR BAITHA
Dr MusafiR BaithA
डाल-डाल तुम हो कर आओ
डाल-डाल तुम हो कर आओ
नंदलाल सिंह 'कांतिपति'
उस रावण को मारो ना
उस रावण को मारो ना
VINOD CHAUHAN
मुक्तक
मुक्तक
डॉक्टर रागिनी
राखी है अनमोल बहना की ?
राखी है अनमोल बहना की ?
तारकेश्‍वर प्रसाद तरुण
मन से हरो दर्प औ अभिमान
मन से हरो दर्प औ अभिमान
Umesh उमेश शुक्ल Shukla
लघुकथा क्या है
लघुकथा क्या है
आचार्य ओम नीरव
#सनातन_सत्य
#सनातन_सत्य
*Author प्रणय प्रभात*
*पानी केरा बुदबुदा*
*पानी केरा बुदबुदा*
DR ARUN KUMAR SHASTRI
शुगर रहित मिष्ठान्न (हास्य कुंडलिया)
शुगर रहित मिष्ठान्न (हास्य कुंडलिया)
Ravi Prakash
अब बहुत हुआ बनवास छोड़कर घर आ जाओ बनवासी।
अब बहुत हुआ बनवास छोड़कर घर आ जाओ बनवासी।
Prabhu Nath Chaturvedi "कश्यप"
23/184.*छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
23/184.*छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
Dr.Khedu Bharti
बे मन सा इश्क और बात बेमन का
बे मन सा इश्क और बात बेमन का
सिद्धार्थ गोरखपुरी
"गरीब की बचत"
Dr. Kishan tandon kranti
जो दिल दरिया था उसे पत्थर कर लिया।
जो दिल दरिया था उसे पत्थर कर लिया।
Neelam Sharma
10) “वसीयत”
10) “वसीयत”
Sapna Arora
सार छंद विधान सउदाहरण / (छन्न पकैया )
सार छंद विधान सउदाहरण / (छन्न पकैया )
Subhash Singhai
Iss chand ke diwane to sbhi hote hai
Iss chand ke diwane to sbhi hote hai
Sakshi Tripathi
You can't AFFORD me
You can't AFFORD me
Vandana maurya
अनजान राहें अनजान पथिक
अनजान राहें अनजान पथिक
SATPAL CHAUHAN
संघर्ष से‌ लड़ती
संघर्ष से‌ लड़ती
Arti Bhadauria
मुक्तक
मुक्तक
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
कड़वाहट के मूल में,
कड़वाहट के मूल में,
sushil sarna
Loading...