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6 Feb 2022 · 9 min read

चौकड़िया छंद / ईसुरी छंद , विधान उदाहरण सहित , व छंद से सृजित विधाएं

चौकड़िया छंद (ईसुरी छंद )/( टहूका छंद )
यह छंद 16 – 12 में एक अपने विधान के साथ लिखा जाता है

1- चौकड़िया छंद के प्रथम चरण का प्रारंभ चौकल से ही प्रारंभ होगा (जगण 121 छोड़कर ) व 16 की यति की तुकांत चरणांत से मिलाई जाएगी |
व हर पद में यति व चरणांत चौकल से ही किया जाता है , (रगण 212 जगण 121 तगण 221 ) छोड़कर

बैसे मात्रा मापनी में चौकल ही बनाए जाने का प्रयास किया जाता है

2 – यह छंद चार पद में ही लिखा जता है , जिसकी पदांत तुकातें मिलाई जती है

3-;प्रथम पद के सौलह मात्रा की चौकल यति भी तुकांत में शामिल होती है
कहने का संकेत यह है कि लेखक /कवि को एक चौकड़िया लिखने में पांच तुकांते चाहिए | व एक बार प्रयोग की गई तुकांत दुवारा प्रयोग नहीं होगी , भले ही अर्थ अलग हो |

3 – अंतिम पद में कवि नाम की छाप के साथ एक कथ्य संदेश ध्वनित करता है

यह छंद कहने पढ़ने में बहुत ही आनंद देता है

इस छंद में बुंदेेलखंड के महा जनकवि ईसुरी जी ने इतना लिखा कि इसका नाम ही ईसुरी छंद हो गया , व बुंदेली बोली में टहूका छंद ( तथ्य युक्त लघु कविता ) नाम मिला है , बैसे इसका साहित्यिक नाम चौकड़िया ही रखा गया है ,जिसका प्रादुर्भाव. सन् 1840 के आसपास ईसुरी कवि के द्वारा किया गया था |

इस छंद को आंचलिक लोकभाषा में ग्रामीण परिवेश के लोग हर त्योहार /अवसर पर गाते पढ़ते है ,, होली के अवसर पर ” ईसुरी की फागें ” इसी छंद में गाई जाती है

हम इस छंद को खड़ी हिंदी में लिखकर प्रस्तुत कर रहे हैं व आपसे भी इस विधा पर सृजन करने का अनुरोध करते हैं
हम तुकांत हेतु #हेज का चिन्ह लगाकर संकेत कर रहे है
उदाहरण ~
गणपति कृपा सभी पर #करते , पीड़ा जन की #हरते |
विध्न विनाशक कहलाते है , संकट जिनसे #डरते ||
प्रथम पूज्य का पद पाया है , मंगल. जिनसे #झरते |
शरण सुभाषा जो भी रहता , भव सागर से #तरते ||1

(उपरोक्त चौकड़िया में -प्रथम पद में करते – हरते – व शेष पदो में डरते- झरते – तरते
इस प्रकार पांच तुकांते प्रयोग की गई है ) इसी तरह प्रत्येक चौकड़िया में पांच तुकाते पिरोई जाती है )

प्रश्न – गणपति कृपा सभी पर करते ? क्या यहाँ – “कृपा सभी पर गणपति करते ” नहीं हो सकता था ?
कलन- चौकल के बाद त्रिकल त्रिकल द्विकल चौकल =16 मात्रा है , क्या चौकल के बाद चौकल जरुरुी नहीं है

उत्तर समाधान – जी प्रश्न सही है , चूकिं चौकड़़िया का प्रारंभ व यति चौकल से ही नितांत जरुरी है , तब दो चौकल. के ‌बीच में दो और चौकल लाना है , तब दो त्रिकल और एक द्विकल इस तरह समायोजित कर सकते है कि दो चौकल बन सके | या चार चौकल सीधे बन जाए तो अच्छा ही है , चूकिं यह चौकड़िया के प्रथम पद का यति पूर्व का चरण है , जिसे चौकल से ही प्रारंभ करना है , अगर यही चरण दूसरे तीसरे चौथे चरण में होता ,तब ” कृपा सभी पर गणपति करते” हो सकता था ही नहीं , बल्कि कलन के मापदंड से करना ही चाहिए था |

हमने कई चौकड़ियों के” प्रथम पद ” का अध्ययन किया है और यह पाया है कि चार चौकल सीधे न बन सके तो उपरोक्त तरीके से चौकल बना सकते है
~~~~~~~~~~~~~~~~~
मै यहाँ एक ईसुरी जी की चौकड़िया उदाहरणार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ

हंसा फिरत विपत के मारे , अपने देश बिना रे |
अब का बैठे तला तलैया , छोड़े समुद किनारे ||
पैला मोती चुनत हतै , अब ककरा चुनत बिचारे |
अब तो ऐसे फिरत ईसुरी , जैसे मौ में डारे ||

(हंसा फिरत विपत के मारे ) हंसा और मारे के मध्य – फिरत विपत के” दो चौकल मान्य हो रहे है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अन्य उदाहरण का सृजन निम्न प्रकार किया है

गौरा जग की जननी #माता , जिनका सबसे #नाता |
शंभू के सँग रहें हिमालय , हर प्राणी है ध्याता ||
गणपति जिनके सुत कहलाते ,सुख साता के दाता |
विनय ‘सुभाषा’ जिनकी करके , मनबांछित फल पाता ||

{प्रथम पद की यति ” माता ” की तुकांत ” नाता” पदांत में मिलाई है , जो चौकडिया छंद में आवश्यक है , बाकी शेष चरणों में नहीं मिलाई जाती है )

इसी तरह कई अन्य उदाहरणार्थ चौकड़िया प्रस्तुत है

पाकर शंकर जी की #बूटी , सबने मिलकर #लूटी |
लगे घोटने फक्कड़ बनकर , कपड़े लटका खूँटी ||
आई निदियाँ भँगिया पीकर , खाट थाम ली टूटी |
कहत “सुभाषा” सजनी रूठी, कहती किस्मत फूटी |

खाकर शिव जी भँगिया #गोला , बन जाते है #भोला |
मस्त जमाकर धूनी बोलें , लाओं जी छै तोला ||
नंदी बाबा सेवा करते , कहते मेरे मोला |
पूरी बूटी चढ़ी ‘ सुभाषा’. , खाली है अब झोला ||

रखते बातों का वह भन्ना , बनते सबके नन्ना |
खड़े बांस को कहते सबसे , यह है मीठा गन्ना ||
माने समझदार वह खुद को , बाकी सबको मुन्ना |
कहत सुभाषा फुरसतिया बन, खोटे बने अठन्ना ||

राजा राज महल में नामी, सांप रहत है वामी |
ज्ञान खोजता साधू हरदम, कीचड़़‌ खोजे कामी ||
हंसा मोती चुनता रहता , पसंद करे न खामी |
कहत ‘सुभाषा” कागा जानो, सदा कुटिलता गामी ||

सज्जन जब हर दर पर जाता , , लोग न जोड़े नाता |
,दुर्जन का सब स्वागत करते , कहते उसको भ्राता ||
मक्कारो को मिले सफलता ,सत्य पराजय‌ पाता |,
कलयुग के यह हाल सुभाषा , कागा रवड़ी खाता ||

देखो भैया प्रथम कुँवारे , बनते सबसे न्यारे |
मूँछ सफाचट करके घूमें, नैनन. करें इशारे ||
छोरी माते की है भोली , देखत. रहे नजारे |
कहत ‘सुभाषा’ उस भोली से , खड़े न रहना द्वारे ||

नैना उसके दीपक जैसे , कह दूँ जाकर कैसे |
चमक दमक है सूरज जैसी , लगे न ऐसे बैसे ||
जड़े हुए है मुख मंडल पर , ज्यों मोती के पैसे |
सोच “सुभाषा” हमसे गोरी , बोले जैसे तैसे ||

नारी बनती जब चिंगारी , है चंडी अवतारी |
लंका जलकर भस्म हुई थी , मिटी कुटिलता ‌सारी ||
सौ पुत्रों को रण में देखा , खो बैठी गंधारी |
नहीं सुभाषा नारी छेड़ो , नारी सब पर भारी ||

गोरी खड़ी-खड़ी मुस्कानी , चर्चा बनी कहानी |
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी ||
सागर जैसा मचला योवन , लहरें कहें जवानी |
कहे सुभाषा डूबो प्यारे , पाकर. गहरा पानी ||

गोरी हँसकर करे किनारा , दिल लगता तब हारा |
मुड़कर देखे जब घूँघट से , मन का उछले पारा ||
विधिना ऐसी सजा न देना , घूमू मारा – मारा |
कहे सुभाषा प्यार अनोखा , गोरी का यह सारा ||

गोरी खड़ी-ख़ड़ी मुस्काए घूँघट से नैन चलाए |
चूड़ी खनका करे इशारा , अपने पास बुलाए ||
पैजनिया के घूँघुरु बजते , बैचेनी बतलाए |
कहत ‘सुभाषा’ भीड़ जुटी है , कैसे अब मिल पाए ||

सज्जन दर- दर ठोकर खाता , , लोग न जोड़ें नाता |
दुर्जन का सब स्वागत करते , कहते उसको भ्राता ||
मक्कारो को मिले सफलता ,सत्य पराजय‌ पाता |,
कलयुग के यह हाल सुभाषा , कागा रवड़ी खाता ||

काँटे यहाँ आदमी बोता , पड़ा चैन से सोता |
खुद को ही जब आकर चुभते,सबके सम्मुख रोता ||
कौन कहे अब उनसे यारो, लेता जैसा गोता |
कर्म उदय में आता है जब , फल बैसा ही होता ||

ऐसे काम नहीं अब करना , पड़े किसी से डरना |
चार लोग जब मुख पर थूकें , पड़े शर्म से मरना ||
बोल सदा ही मीठे बोलो , ज्यों शीतल हो झरना |
कर्म नहीं यदि खोटे छोड़े , सभी बुरा है वर्ना ||

~~~~~
अब यही सभी चौकडिया – मुक्तक में
( पूरा विघान छंद की तरह ही होगा , व तीसरा पद अतुकांत जाएगा किंतु यति की तुकांत , पदांत से मिलान होगी , तभी मुक्तक रोचक होगा | छंदानुरुप यह अन्वेषण ही मुक्तक हेतु उपयुक्त. है
#हैज लगाकर संकेत है

गणपति कृपा सभी पर #करते , पीड़ा जन की #हरते |
विध्न विनाशक कहलाते है , संकट जिनसे डरते |
प्रथम पूज्य का पद है #पाया , मंगल. जिनकी #माया ~
शरण सुभाषा जो भी रहता , भव सागर से तरते |

गौरा जग की जननी #माता , जिनका सबसे #नाता |
शंभू के सँग रहें हिमालय , हर प्राणी है ध्याता |
गणपति जिनके सुत #कहलाते , जिनसे सुख है #पाते ~
विनय ‘सुभाषा’ जिनकी करके , मनबांछित फल पाता |

पाकर शंकर जी की #बूटी , सबने मिलकर #लूटी |
लगे घोटने फक्कड़ बनकर , कपड़े लटका खूँटी |
आई निदियाँ भँगिया #पीकर , सबने पाई #जीभर ~
कहत “सुभाषा” सजनी रूठी, कहती किस्मत फूटी |

खाकर शिव जी भँगिया #गोला , बन जाते है #भोला |
मस्त जमाकर धूनी बोलें , लाओं जी छै तोला |
नंदी बाबा सेवा #करते , हाथ जोड़कर #कहते ~
पूरी बूटी चढ़ी ‘ सुभाषा’. , खाली है अब झोला ||

रखते बातों का वह #भन्ना , बनते सबके #नन्ना |
खड़े बांस को कहते सबसे , यह है मीठा गन्ना |
समझदार वह खुद को #जाने, नहीं किसी की‌ #माने~
कहत सुभाषा फुरसतिया बन, घूमें लेकर छन्ना |

राजा राज महल में #नामी, सांप रहत है #वामी
ज्ञान खोजता साधू हरदम, कीचड़़‌ खोजे कामी |
हंसा मोती चुनता #रहता , या भूखा‌‌ ही #मरता‌ ~
कहत ‘सुभाषा” कागा जानो, सदा कुटिलता गामी |

देखो भैया प्रथम #कुँवारे , बनते सबसे #न्यारे |
मूँछ सफाचट करके घूमें, नैनन. करें इशारे |
छोरी माते की है #भोली , सब मिल.करें #ठिठोली ~
कहत ‘सुभाषा’ उस भोली से , खड़े न रहना द्वारे |

नैना उसके दीपक #जैसे , कह दूँ जाकर #कैसे |
चमक दमक है सूरज जैसी , लगे न ऐसे बैसे |
जड़े हुए है मुख पर #तारे , लगते सबको #प्यारे ~|
सोच “सुभाषा” हमसे गोरी , बोले जैसे तैसे |

नारी बनती जब #चिंगारी , है चंडी #अवतारी |
लंका जलकर भस्म हुई थी , मिटी कुटिलता ‌सारी |
सौ पुत्रों को रण में #लेखा , मरते सबको #देखा ~
नहीं सुभाषा नारी छेड़ो , नारी सब पर भारी |

गोरी खड़ी-खड़ी #मुस्कानी , चर्चा बनी #कहानी |
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी |
सागर जैसा योवन #मचला,ज्यों नहले पर #दहला ~
कहे सुभाषा डूबो प्यारे , पाकर. गहरा पानी |

गोरी हँसकर करे #किनारा , दिल लगता तब #हारा |
मुड़कर देखे जब घूँघट से , मन का उछले पारा |
विधिना ऐसी सजा न #देना , चाहे कुछ भी #लेना~ |
कहे सुभाषा प्यार अनोखा , गोरी का यह सारा |

चौकड़िया मुक्तक

दिखते जहाँ लुटेरे दाता, करते प्रभु से नाता |
खुद को ही वह धोखा देते , मैं ‌सबको बतलाता |
ढ़ेर लगा हो घर में जितना, दान बाँट दें कितना~
पाप किए है जो जीवन में , फल पूरा ही पाता ||

पैसा लेकर ही जो ठाने , लेने को मुस्कानें |
ठग जाते है दर्द मिले जब , बन जाते बेगानें |
देखा सबने उनके दर पर , खुशी नहीं है घर पर ~
परहित से ही खुशिया मिलती, बात न इतनी जानें |
~~~~~`

चौकड़िया छंद विधान में #पद काव्य सृजन
{टेक के बाद बाले केवल एक चरण में यति की तुकांत की तरह होगी ) शेष चरणों में सामान्यता नियम तुकांते होगी | #हेज लगाकर संंकेत दे रहे है |

सबकी झोली भरते |
गणपति कृपा सभी पर #करते , पीड़ा जन की #हरते ||
विध्न विनाशक कहलाते है , संकट जिनसे डरते |
प्रथम पूज्य का पद पाया है , मंगल. जिनसे झरते ||
शरण सुभाषा जो भी रहता , भव सागर से तरते |
नाम अमर कर जाते जग में , कभी नहीं वह मरते ||

माता के गुण गाता |
गौरा जग की जननी #माता , जिनका सबसे #नाता ||
शंभू के सँग रहें हिमालय , हर प्राणी है ध्याता |
गणपति जिनके सुत कहलाते ,सुख साता के दाता ||
विनय ‘सुभाषा’ जिनकी करके, मनबांछित फल पाता |
लाज रखे जन-जन की जननी , जो ‌‌ शरणागत आता ||

निकला स्वर बम बोला |
खाकर शिव जी भँगिया #गोला , बन जाते है #भोला ||
मस्त जमाकर धूनी बोलें , लाओं जी छै तोला |
नंदी बाबा सेवा करते , कहते मेरे मोला ||
पूरी बूटी चढ़ी ‘ सुभाषा’. , खाली है अब झोला |
जितनी थी परसादी घर में , हमने सबको‌ घोला ||
~~~~~~~~~~
चौकड़िया छंद में #गीतिका लिख सकते है , हम #हेज लगाकर तुकांतो का संकेत कर रहे है

नारी बनती जब #चिंगारी , तब चंडी ‌ #अवतारी |
सभी जानते क्या होता है , मिटे कुटिलता सारी ||

रावण ने जब सीता #हर_ली, वहीं खुदकशी #कर_ली ,
लंका जलकर भस्म हुई थी , छाई थी लाचारी |

सौ पुत्रों को रण में #लेखा , मरते सबको #देखा ,
नारी होकर नारी से भी , हारी थी गँधारी |

नाम सुना झांसी की #रानी , कहलाई #मर्दानी ,
दांत हुए गोरो के खट्टे , जब कीन्ही तलवारी |

कभी न समझो नारी #अबला , समय पड़े है #सबला ,
नहीं सुभाषा नारी छेड़ो , नारी सब पर भारी ||

~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चौकड़िया छंद में #गीत
#हेज लगाकर तुकांत विधान का संकेत कर कहा हूँ

गोरी खड़ी-खड़ी #मुस्कानी , चर्चा बनी #कहानी | ( मुखड़ा)
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी ||( टेक)

नैना उसके दीपक #जैसे , कह दूँ जाकर #कैसे | ( अंतरा )
चमक दमक है सूरज जैसी , लगे न ऐसे बैसे ||
जड़े हुए है मुख मंडल पर , ज्यों मोती के पैसे |
सोच “सुभाषा” हमसे गोरी , बोले जैसे तैसे ||

सागर जैसा योवन #पानी , लहरें कहें #जवानी | (पूरक )
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी ||(टेक )

गोरी हँसकर करे #किनारा , दिल लगता तब #हारा | ( अंतरा)
मुड़कर देखे जब घूँघट से , मन का उछले पारा ||
विधिना ऐसी सजा न देना , घूमू मारा – मारा |
कहे सुभाषा प्यार अनोखा , गोरी का यह सारा ||

कहे सुभाषा सबने #ठानी , चले डूबने #पानी ||(पूरक )
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी ||(टेक )

गोरी खड़ी-ख़ड़ी #मुस्काए घूँघट से नैन #चलाए |
चूड़ी खनका करे इशारा , अपने पास बुलाए ||
पैजनिया के घूँघुरु बजते , बैचेनी बतलाए |
कहत ‘सुभाषा’ भीड़ जुटी है , कैसे अब मिल पाए ||

गोरी की है अजब #कहानी , मन करता #नादानी |
छैला आए बातें करने , जोड़़े नात पुरानी ||(टेक )

©®सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Language: Hindi
Tag: लेख
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