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2 Feb 2024 · 1 min read

ग़ज़ल

एक मुद्दत से नहीं सोया हूँ घर में यारो
ज़िन्दगी बीत गई सिर्फ़ सफ़र में यारो

सारी दुनिया को इनायत से नवाज़ा है मगर
एक बस मैं ही नहीं उसकी नज़र में यारो

पेट की आग से जलता है लहू भूखे का
दीप जलते नहीं इस आग से घर मे यारो

केमिकल रिश्तों के पेड़ों में भी जब लगने लगे
तब से लज़्ज़त न रहा अब के समर में यारो

चाहे जितनी भी मरासिम की हो गहराई मगर
अब वो सच्चाई नहीं मिलती बशर में यारो

जिसने माँ बाप को छोड़ा है अनाथालय में
डूबती उसकी ही कश्ती है भँवर में यारो

जाने कब मौत का फ़रमान यहाँ मिल जाये
ध्यान से चलना है प्रीतम को सफ़र में यारो

प्रीतम श्रावस्तवी

Language: Hindi
55 Views
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