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16 Jan 2024 · 1 min read

ग़ज़ल

एक मुद्दत से नहीं सोया हूँ घर में यारों
ज़िन्दगी बीत गई सिर्फ़ सफ़र में यारों

सारी दुनिया को इनायत से नवाज़ा है मगर
एक बस मैं ही नहीं उसकी नज़र में यारों

पेट की आग से जलता है लहू भूखे का
दीप जलते नहीं इस आग से घर मे यारों

केमिकल रिश्तों के पेड़ों में भी जब लगने लगे
तब से लज़्ज़त न रहा अब के समर में यारों

चाहे जितनी भी मरासिम की हो गहराई मगर
अब वो सच्चाई नहीं मिलती बशर में यारों

जिसने माँ बाप को छोड़ा है अनाथालय में
डूबती उसकी ही कश्ती है भँवर में यारों

जाने कब मौत का फ़रमान यहाँ मिल जाये
ध्यान से चलना है प्रीतम को सफ़र में यारों

प्रीतम श्रावस्तवी

Language: Hindi
48 Views
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