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1 Oct 2022 · 1 min read

*केले खाता बंदर (बाल कविता)*

केले खाता बंदर (बाल कविता)
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
दस-दस केले खाता बंदर
छिलके वहीं गिराता बंदर

बल खाती बंदरिया आई
रपटी छिलके पर टकराई

सिर फूटा तो शोर मचाया
बंदर को डॉंटा-समझाया

केले चाहे जितने खाओ
छिलके लेकिन नहीं गिराओ
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
रचयिता : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451

1 Like · 179 Views
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