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15 Feb 2024 · 1 min read

काश यह मन एक अबाबील होता

काश यह मन एक अबाबील होता
और उड़ जाता परिंदे की तरह समय से परे
जहां कुल्ल्ढ़ की चाय के साथ
गुजारने को “वख्त” होता था

अब तो वो बिना देखे ही “गुजर” जाते हैं
“वख्त” ही नहीं ठहरने का !!

फिर लौट जाता – उस बचपन में
जहां कर पाता पूरे वह सारे सपने
अरमान अधूरे खेलता वो सारे खेल ,
मिल पाता उनसे कह देता मन की बात

और फिर काट देता मन –
परिंदे के पर और उड़ नहीं पाता
ठहर जाता वहीँ काश यह मन

एक परिंदे की तरह जो उड़ जाता
और समय से परे फिर लौट जाता बस
लौट के नहीं आता !!

Language: Hindi
92 Views
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