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31 Mar 2024 · 1 min read

आखिर कुछ तो सबूत दो क्यों तुम जिंदा हो..

आखिर कुछ तो सबूत दो क्यों तुम जिंदा हो..
क्यों फिर छोटी-छोटी बातों पर तुम शर्मिंदा हो

खुला आसमान खुली हवाएं अंतर्मन में ज्वाला..
फिर भी पर नहीं फेहराये ऐसा कौन परिंदा हो |

कवि दीपक सरल

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