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Author: Mudassir Bhat

Mudassir Bhat
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श्रीनगर जम्मू-कश्मीर से, धरती के उस हिस्से से जिसे स्वर्ग कहा जाता है. इसी स्वर्ग की वास्तविकता को दर्शाने के लिए "स्वर्ग विराग" काव्य-संग्रह की रचना हुई है, जो चंद्रलोक प्रकाशन कानपुर के प्रकाशित हुआ है. कब से ढूंढ रहा हूँ खुद को मुझमें मेरा कुछ भी नहीं हैं.

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

बीत गया है पूरा साल

कब तक करे अब हम मलाल बीत गया है पूरा साल, फिर शहर में न हो बवाल [...]

यही स्वर्ग है

ढक रही हैं चोटियाँ... बर्फ़ से, चारों ओर दिख रहा हैं एक मासूम [...]

फूलों में बारूद

तुम्हे शोभा नहीं देता कि तुम आंसों बहाओ आँखें फोड़कर तुमने [...]

मुझे खेद है

मुझे खेद है उनके प्रति जिनको कुत्तों से दोस्ती है चील कौओं [...]