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7 Apr 2017 · 1 min read

फूल मैं/ प्रीति के अनुकूल-सा

दोपहर की धूल में,
पड़ा,दूँ सुख-चूल मैं|
गम न, मुझको रौंद दो|
पैर तुम ,तो फूल मैं|

दिव्यता की चूल-सा|
सुगंधित गुण-फूल-सा|
भारतमय उपवन है|
प्रीति के अनुकूल-सा|

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए”एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

पड़ा=लेटा हुआ

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