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6 Apr 2017 · 1 min read

मोरे घनश्याम

मोरे घनश्याम

दरश दिखा के
प्यास जगा के
कुछ क्षण मोरे
संग बीता के शाम !

मुझ विरहन को
तू छोड़ अकेला
कौन देस गया
हे मोरे घनशाम !

मैं पल-पल जलूँ
ना जिऊँ ना मरूँ
ढड़े नैनों से नीर
मन को ना आराम !

कजरा संग अँखियां
बिंदिया संग लिलरा
वेणी संग मोर जूड़ा
निक लागे नाहिं राम !

तुझ संग सब निक लागे
सब हौं अब तो अभागे
काहे का करूँ मो सिंगार
कौन नाहिं इनके दाम !

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दिनेश एल० “जैहिंद”
06. 02. 2017

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