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6 Apr 2017 · 1 min read

(नज़्म ) हमसफर न रहा

हम सफर मे रहे
हमसफर न रहा
चाहतों का यहाँ
कुछ असर न रहा ।

यूँ ही उड़ते रहे
फड़फड़ाते हुये
बैठना जिस पे चाहा
वह शज़र न रहा ।

हमने चाहा बहुत
डूबना तो मगर
ताकते रह गये
वह भँवर न रहा ।

अब तो बदले से
लगते हैं मंज़र यहाँ
जाने खो गईं गली
वह शहर न रहा ।

यूं भटकते रहे हम
हर इक मोड़ पर
राह चुभती रही
अब गुज़र न रहा ।।

गीतेश दुबे ” गीत “

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