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4 Apr 2017 · 1 min read

अक्स

एक अक्स है जो,
रातों की मेरी परवाह करता है;
मुझमें समाहित सा
मुझमें साँसे भरता रहता है
जिन्दगी जो कभी
कारगर नहीं हुई संघर्षों में
मगर वो रहा साथ मेरे
मुझे ढोता रहा
मेरे खोते वजूद को
सँभालता रहा
सूखे अधरों की प्यास
जो कभी बुझ नहीं पाई
वो मेरे अश्कों से
शायद शांत पड़ गई
उसे भी सहारा मिला
मेरे टूटते वजूद का
तिलमिलाती रही
जवानी मेरी बुझती सी
मगर वो बर्फ होते
खुद को देखता रहा
निभाता रहा साथ
चलता रहा कदम से कदम मिलाकर
धीरे-धीरे उन अंतिम क्षणों की ओर
बढ़ रहा है वो
मगर फिर भी देखता है
उस टिमटिमाती लौ को
उसे विश्वास है शायद
अभी उसमें काफी शोख बाकी है
पर सच जो टलता नहीं है
वो शनैः शनैः बढ़ रहा है
दबे पाँव से
आखिरी मंजिल की ओर
धँस गईं हैं आँखों की स्याह कोरें भी
बढ़ गई है उनकी
धुंधलाहट रूई के गोलों की तरह
और इस तरह अब
वो भी समझ गया है
कि मिट्टी अब मिट्टी से मिलने जा रही है
पंछी अब अपनी
आखिरी उडा़न की ओर बढ़ रहा है
पडा़व अंतिम जो दूर नहीं है अब
सिमट गई है शाम की पसरती चादर भी
लो आ गई है रात फिर
जिसकी परवाह करता था अक्स मेरा
पर वही सोने जा रहा अब
उसके स्याह आगोश में
सोनू हंस

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