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4 Apr 2017 · 1 min read

वो बात अब नहीं जमाने में

वो बात नहीं अब जमाने में,
जो कभी हुआ करती थी;
वो हवाएँ अब नहीं चलती,
जो कभी चला करती थी।

जिंदगी मसरूफ थी तो क्या हुआ,
दिलो में प्यार हुआ करता था;
बातों में वो अहसास था,
जो दिलों को छुआ करता था।

अब वो दूरियाँ नहीं,
जो कभी फासला हुआ करती थी।

नज़र न आए कोई साथी,
तो घर तक पहुँच जाते थे;
पानी यहाँ पीते तो,
खाना वहाँ खाया करते थे।

नहीं इश्क की अब वो हसरतें,
जो आसमानों को छुआ करती थी।

नहीं है प्यार का वो जज्बा,
अ ‘हंस’ अब जमाने में,
अब तो साकी अलग मिलते हैँ,
यहाँ हर एक मयखाने में।

वो घर भी हमने देखा है,
जिसमें दो दीवारें नहीं हुआ करती थी।

सोनू हंस

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