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2 Apr 2017 · 1 min read

आधार

“आधार ”
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झीने पट में
झिलमिल करती !
एक अलबेली नार |
बैठ तरंगिनी
के तट पर !
करती स्वेच्छाचार |
निरख रही है ,
नदी के जल को !
समझ रही है सार |
जल के बिन
सब सूना-सूना !
जल ही है आधार ||
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डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”

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