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30 Mar 2017 · 1 min read

मुहोबत : ख्वाब या हकीक़त (ग़ज़ल )

मुहोबत : ख्वाब या हकीक़त (ग़ज़ल )

ऐ खुदा ! तेरी दुनिया में मुहोबत बस एक खवाब है,

जिसका एक अफसाना किताबों के सिवा कहीं नहीं ।

अश्कों को पोंछने वाले ,दर्द-ऐ-दिल मिटाने वाले ,

हकीक़त में होते हैं क्या ? हमने तो कभी देखा नहीं. ।

ख्वाबों में ही देखा की कोई आया हमें थामने ,

मगर जब आँख खुली तो पाया कोई भी नहीं. ।

तड़पकर रोये अपने ही दामन में मुंह छुपाकर,

क्या करें ! अश्क पोंछने को किसी का दामन जो नहीं. ।

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