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30 Mar 2017 · 1 min read

बेबस

क्या फर्क पड़ता है वो हँसे या रोये,
उन्हें तो बस उसके जिस्म से प्यार है,
वो कहाँ पहचान पाते हैं उसके आसुओं को बारिश में,
न जाने वो कौन सी हवस के शिकार हैं,
जब वो भरती है आहें बिस्तर पे उनके नजदीक,
समझते वो उसे बेबस और लाचार हैं,
वो टूट कर बिखरती है जाने कितनी दफा उनके लिए,
मगर उन्हें कहाँ उसकी किसी अदा पे ऐतबार है,
खरीद लिया है उसको उन्होंने चंद रकम देकर,
अब तो उसपे पूरी तरह उनका ही अधिकार है,
लायक छोड़ा ही नहीं उसको ख़ुशी से रहने के लिए,
अब तो उनका दिल बहलाना ही उसका कारोबार है,

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