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10 Mar 2017 · 1 min read

मेरा सफर

जब भी हम सफर में जाया करते हैं,
हर बार कुछ नया पाया करते हैं,
आज देखा एक बूढी औरत को इतना लाचार,
न थी पैरों में चप्पल न था कोई घर बार,
सोचा रुक कर पूछू उनसे एक सवाल,
पास जाकर पता चला की उनके पास तो थी ही नहीं आवाज,
कितना बेबस था उन बूढी माँ का संसार,
जिनके जीवन में ग़मों की थी बौछार,
उनकी इतनी तकलीफ देखकर हम कुछ भी न कह पाए,
मगर घर आकर एक पल भी सुकून से न रह पाए,
बार बार उनका बेबस चेहरा आखो में आता था,
और उनके साथ कुछ न करने का गम मुझे खाता था,
उस दिन से आज तक जब भी हम सफर में जाते हैं,
कुछ जोड़ी चप्पल और कुछ कपडे साथ में ले जाते हैं,
मांगता नही वो कभी जिसमे होता है स्वाभिमान,
और हम ऐसे लोगो को न देकर गिराते हैं अपना ईमान,
मदद करो सबकी इससे आपका कुछ नही जायेगा,
शायद घर आकर आपको थोड़ा सा सुकून जरूर मिल जायेगा,RASHMI SHUKLA

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