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9 Mar 2017 · 2 min read

यह वही नारी है

निडर और स्वावलंबी बनकर अपनी छवि निखारी है असहाय और अबला नहीं शक्तिपुंज वह नारी है
अपनी शक्ति से वह अब तलक अनजान थी सब कुछ सहकर भी चुप रहना ही उसकी पहचान थी
अन्याय के विरुद्ध आज जिसने आवाज़ उठाई है साहस के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है
उसकी शक्ति से डरने वाले इतने भयभीत हो जाते थे कहीं जाग न जाए वह इतना उसको दबाते थे
अन्याय की हद जब पार हो जाती है तब अन्याय से लड़ने को वह बाध्य हो जाती है
उसने कभी न चाहा था घर से बाहर निकलना अपना सुख चैन छोड़ यों दो पाटों में पिसना
तुम्हारे सुख दुःख में उसने दिया योगदान सबके सुख की खातिर उसने किया खुद को कुर्बान
उसकी इस सरलता पर जब हुआ कुठाराघात अपना अस्तित्व बचाने को तब किया उसने प्रतिघात
बुद्धि चातुर्य कला कौशल में उसे न कोई डिगा पाया अपनी कुटिल चालों से ही तब उसको नीचा दिखलाया
उसकी पवित्रता पर चोरी से सबने वार किया निर्लज्ज चरित्रहीन जैसे विशेषणों से अपमानित किया
मानव जाति को जिसने जन्मा अपनी जान की मांगे भीख मुझे मत मारो मौत के घाट न उतारो कहे चीख चीख
अपना घर हो या बाहर कहीं नहीं वह सुरक्षित अपना नारीत्व बचाने को सदा रही वह चिंतित
प्रेम व सुरक्षा जैसे अधिकारों से है वंचित समाज और राष्ट्र से जिसको कृतज्ञता है अपेक्षित
राष्ट्र आज प्रगति पर है परम्पराएं हैं पुरानी नारी के लिए वही अग्नि परीक्षा पुरुषों की चलती मनमानी
पुरुषों के किये का दंड क्यों भुगते नारी क्यों किसी के कुकृत्य की उस पर हो जिम्मेदारी
सड़ी गली कुरीतियों का अब उन्मूलन क्यों न हो भय, क्रूरता और हिंसा से मुक्त नारी जीवन क्यों न हो
नारी कल भी सशक्त थी आज भी जिसने हिम्मत न हारी है अपनी आभा फैलाने वाली शक्तिपुंज विजेता यह वही नारी है

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