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8 Mar 2017 · 2 min read

महिला दिवस पर विशेष कविता

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मनभावन कुछ भी नहीं, जो मिला वही संजोया मैंने
आंँसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
जब नदिया बही बनी मैं धारा
बहती रही छोड अपना किनारा
तडप मिलन की जब कभी उभरी
सँभाला खुद को दे कोई सहारा
बिषम हालातों में भी अपना धीरज नहीं गंवाया मैंने
आंसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
आया सावन झूलों ने डेरे डाले जब
मस्त फुहारों ने सपने कई उकारे तब
जब सखियां हंसी, हंसी संग उनके
जख्म अपने नहीं कभी उघाडे तब
याद कर साजन को ख्बाब नहीं, कोई नया बोया मैंने
आंसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
मीरा बन करती रही बिषपान रोज
चल रही प्रेमपथ पर बन अनजान रोज
बिष आया, कष्ट आया, आया न कृष्ण कोई
ले आस आंखों में करती रही इंतजार रोज
टूटी आस,टूटा बांध सब्र का, पर धीरज नहीं गंवाया मैंने
आंसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
दैख ताज मुहब्बत का कभी कभी इतरायी मैं
आलिंगनबद्ध देख प्रेम को कभी कभी शरमायी मैं
अहसास उसकी छुअन का कर अपने तन पर
सोचा जो मैंने कभी, तो हाय तभी घबरायी मैं
किस्मत हंसी देख जब मुझे,अश्रुमोती नहीं कोई खोया मैंने
आंसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
उडा परिंदा जब कहीं, देखा अपने पर को
पांव तले धरती नहीं, आसमां न सर को
त्रिशंकु सी लटक रही दो जहां के बीच
मौत मिली नहीं, लौट सकी न घर को
उफ!इस विक्षिप्त मन में कैसे सांसों को दौड़ाया मैंने
आंसू अंतर्मन प छिड़के पर आंचल नहीं भिगोया मैंने
वंदना मोदी गोयल

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