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28 Feb 2017 · 1 min read

गीत।इक नयी पहचान दे दो ।

।नवगीत।इक नयी पहचान दे दो ।

जल रहा है बिश्व सारा क्रोध में अभिमान में ।
फर्क घटता जा रहा अब जानवर इंसान में ।
मानवता के
लिये निज
स्वार्थ का बलिदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।

उठ रही घातक भयंकर आंधियों का जोर है ।
चल इन्हें रोकें तूफानी हो रहा अब सोर है ।।
इस कालिमा में
ज्ञान का
फिर नया विहान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।

लो सपथ घनघोर कुहरों सा भयंकर तम न हो ।
लोग मुस्काते मिले घर दर -बदर मातम न हो ।
नेक चेहरों
पर हँसी का
कीमती अनुदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।

तुम अपंगों के लिये बैसाखियाँ सुदृड़ बनोंगे ।
नाथ बनकर के अनाथों का हृदय पावन करोगें ।।
नित गले
उनको लगाकर
बस जरा सम्मान दे दो ।।
इक नयी पहचान दे दो ।।

रिस्तों में नाहक बढ़ी दूरियाँ दुःख को सजोंती ।
अमृत सी जिंदगी में बेवजह विष घोल जाती ।।
शांति की नदियां
बहाकर
प्रेम का वरदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।

©© राम केश मिश्र

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