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28 Feb 2017 · 1 min read

कनॉट प्लेस

दिल्ली का दिल
कनॉट प्लेस
एक वृत्त पर सीमित
सफेद खंभों
पर टिकी इमारतें
जो याद दिलाती
हमारी गुलामी की
चौराहे के धूरी पर घूमती दो
जिन्दगियाँ
एक इंतजार करती
सूर्योदय का
ताकि भर सके
अपने बच्चों का पेट
दूसरा सूर्यास्त का
जो कुचल सके
भारत की संस्कृति को
हर रिश्ता यहाँ कारोबार सा
हर कोने में अधनंगे बच्चे
जो बन जाते है तस्वीरे
सैलानियो के
क़ैद हो जाते है उनके कैमरो में
बन जाती है ख़बर
जो देखते है आजादी के
बाद का हिंदुस्तान
आज भी यहाँ बच्चे
उठते हैं जूठे पत्ते
एक दूसरे को खिलाते
साथ में पार्किंग
जहाँ जेठ के दोपहरी में भी
अश्लीलता की प्रकाष्ठा को
व्यक्त करते लोग
बनावटी जिन्दगी में समेटे खुद को
विदेशों से त्यागे कपड़ो को खरीद
खुद पर इठलाते हुए लोग
केंद्र में बना एक पार्क
जहाँ राजनीति और मनोरंजन
दोनों का होता है खेल
हजारों अत्याचार का शिकार
कनॉट प्लेस
कौन सुने उसकी पुकार को
थक चुका है
और बन गया है गाँधी जी का
बंदर
कहीं हार्ट अटैक ना कर जाये
कनॉट प्लेस का एकदिन।​

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