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25 Feb 2017 · 1 min read

क्या मुर्दे भी कभी कुछ सोचते हैं

ना मैं कुछ देख सकता हूँ
ना सुन सकता हूँ
और ना ही मैं कुछ
बोल सकता हूँ

मैं नहीं जानना चाहता
क्या हो रहा है मेरे आसपास
कौन जिन्दा है
और कौन मर रहा

मैं तो मशगूल हूँ बस
अपनी ही दुनिया में
और घुल रहा हूँ अपनी
रोटी-रोजी की चिंता में

मुझमें नहीं है क्षमता
सोचने, समझने
और कुछ भी
बूझने की

सोचने समझने का काम
तो इंसान करते हैं
और मुझे लगता है कि
मैं इंसान ही नहीं रहा

मैं तो बन गया हूँ बस
एक चलता-फिरता मुर्दा
और तुम ही कहो
क्या मुर्दे भी कभी कुछ सोचते हैं

लोधी डॉ. आशा ‘अदिति’
भोपाल

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