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25 Feb 2017 · 2 min read

अभिलाषा

यह उस बेटी की अभिलाषा है
जो अभी अजन्मा है माँ की कोख़ मे ही है परन्तु उसे भय है कि कही माँ उसे जन्म ही न दें।वह अपनी माँ को मनाने का भरपूर प्रयास कर रही है। यह कविता कुछ दीर्घ अवश्य है।
आशा है आप सभी को पसंद आयेगी।

अभिलाषा
——–

माँ मुझे भी देखनी है दुनियां
कब कहोगी मुझे ओ मुनियां !
शायद कभी नही क्योकि…..
मैं जानती हूँ ऐसा नही होगा।
मेरे स्थान पर तुम्हे …..
एक बेटा ही प्यारा होगा।
माँ मुझे भी…….
माँ तुम जिद् उसकी पूरी कर दों ।
दे दो एक बहना उसको
मैने इस जीवन की सुनी है कहानी।
पापा की बन जाऊंगीं आकर बिटिया रानी।
घर भर दूंगीं मैं खुशियों से।
नही करुंगी कभी मनमानी।
माँ मुझे भी……….
ताऊ और ताई की दुलारी।
बन जाऊंगी बिटिया प्यारी।
ले लूंगी मैं स्नेह सभी का…
एक –एक कर बारी –बारी।
चाचा-चाची संग लड़ूंगी..
झूठी लड़ाई जग से न्यारी।
मॉ मुझे भी …….
खूब पढ़ूंगी खूब लिखूंगी।
ऊँचा तेरा नाम करुंगी…।
सीख करुंगी अच्छे की मैं।
बुरी राह पर नही चलूंगी…।
बुरी दृष्टि मैं देंख किसी की
बन जाऊंगी झॉसी की रानी।
माँ…मुझे भी ……
बात सिर्फ है चंद वर्षो की।
चली जाऊंगी बन मैं किसी की
जो है रीत जगत ने मानी….
बहेंगें फिर अश्रु सभी के…
प्रेम की रीत पुरानी….
माँ…..मुझे भी…..:-
सुना है मैने उस जग में….
कुछ ऐसा होता है…..
जैसा काम जो करता है।
फल उसका ढ़ोता है….
मत कर तू कोई काज ग़लत
मुझको आने दें तू माँ…:।
मॉ मुझे भी……..

सुधा भारद्वाज
विकासनगर उतत्तराखण्ड

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