Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
22 Feb 2017 · 1 min read

कितने संघर्ष आसान हुऐ

धुंध के मानिंद
आज एक बार
सुरों से अलग
फिर कहीं गुजरे
सोंचों के झांझावतों
चिरपिरिचत विचारों में
किसी राहगीर की तरह
परंतु बिना किसी योजन
मानचित्र के, बस यूंही
कुछ राहें याद तो थी
किंतु वे धुमिल और
बहुत धुंधला गयी थी
याद भी नही जैसे
जाने कितना समय
गुजरा होगा,पाटने में
उमर की खाईयों को
कदाचित अनुभवों की
सूची और फाईलों को
राहगीर हैं, कितने बार
आना जाना लगा रहता है
किंतु हैरान है,बेखयाली में
भागते हुए सीधी टेढी राहों में
अरसों से मालूम नही जीवन में
कितने अनगिनत आयाम बने
जाने कितने संघर्ष आसान हुऐ
यूं ही बस चलते कभी रेंगते !!

नीलम “नील”
देहरादून

Loading...