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20 Feb 2017 · 1 min read

फिर तीन दोहे।

फिर तीन दोहे –

मन को पावन राखिये, तन सा निर्मल आप ।
धन का सदुपयोग कर,,,,,,,,,,दूर रहे संताप ।।

निर्धन धन का लालची, भले कृपण कंजूस ।
धनी न सोहत धर्म से ,,,,,,क्यों लेता है घूस ।।

रिस्तों में जब स्वार्थ हो,,, तो कैसा अफ़सोस ।
राम मिलेगा प्रेम से,,,,,,, ही निज को सन्तोष ।।

राम केश मिश्र

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