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20 Feb 2017 · 1 min read

कुछ मत पूछो ! (ग़ज़ल)

मत पूछो की कितने ज़ख्म खाए हुए हैं ,
हम तो दौर -ऐ- हालात के सताए हुए हैं। .

यह पेशानी की सिलवटें, सुर्ख बेनूर आँखें,
दम तोडती तबस्सुम,रंजो-गम से नहाये हुए हैं।

छाई है इस कदर बेखुदी की क्या कहिये !,
दर्द पे है हँसते औ लबो पे आहों के साये हैं।

गुरुर की बुलंद आवाजें और हमारी ख़ामोशी,
किसकी होती जीत? अनु भी सब्र किये हुए है।

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