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14 Feb 2017 · 1 min read

दस्तूर

राहें चलें तो पत्थरों से मजबूर हैं
उपरवाला अपने रुतबे पे मगरूर है
लोगों के दिलों में थोड़ी चाहत तो जरुर है
लेकिन यहाँ फुलों के बदले काँटों का दस्तूर है….

मंजिलों तक पहुंचना अब अपना लक्ष्य कहाँ रहा
ऊपर वाले के सामने रखने को अपना पक्ष कहाँ रहा
यारों के साथ मिलकर मस्ती-यारी करें अब वेसा वक़्त कहाँ रहा
पर नए दोस्त बनाये ऐसी आरज़ू दिल में जरुर है
लेकिन यहाँ फूलों के बदले काटों का दस्तूर है…..

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