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13 Feb 2017 · 1 min read

कोई भी मजबूर न

आज हमारी रचना देखिए कुछ इस तरह

कोई भी मजबूर न

चिल चिलाती धूप मे
तपकर भी तपता नही
कड़ कड़ाती ठंड मे
कपकर भी कपत नही

जो मिले जितना मिले
ठगकर भी कहता नही
जो कहे उसकी सुने
सुनकर थकता नही

ढेरों समस्या जिंदगी में
तो भी घबराता नही
घर नही बिस्तर नही
फिर भी कुछ कहता नही

क्या कहे किससे कहे
कोई खबर लेता नही
सरकार भी तो वेखबर
बात ये भी तो सही

श्रम की कीमत न करे
किसी को लाखों पगार
भेद भाव इस कदर
किसी को बस कुछ हजार

मजदूर ही मजबूर है
आज बस दर वदर
सोचिए इस पर जरा
उसकी कितनी है कदर

न्यूनतम मजदूरी क्यों
मजदूरी उचित हो बस
कोई भी मजबूर होकर
मरने को न हो विबस

गरीबी इसलिए बस
किसी को अशंख दौलत
पैसे पैसे को मुहताज
किसी की रंक हालत

गरीब अपने देश में
आईये चिंतन करें
कौन कितना धन रखे
कुछ तो सीमा तय करें

मजदूर तब खुशहाल
जिंदगी से दूर न
‘अनेकांत’चिंतन बस यही
कोई भी मजबूर न

राजेन्द्र ‘अनेकांत’
बालाघाट दि.१३-०२-१७

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