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13 Feb 2017 · 1 min read

गजल वो शहर में आकर के

वो गाँव से शहर आया तो मेरे हालात पूछता रहा
झूठों की बस्ती के मरे हुए मेरे जज्बात पूछता रहा

वो देखकर आया था ख़्वाब शहर की ऊंचाइयों के
कितना हुआ कत्ल मैं यारो मेरे आघात पूछता रहा

मैं तो कत्ल होता रहा उस रात बार बार किश्तों में
सच में गच्चा खा गया मैं, मेरी औकात पूछता रहा

दरवाजे को ऊँचा कर किया था सर ना लगे कभी
वो भी मेरे नीचे इतना गिर जाने की बात पूछता रहा

शब्द निःशब्द है की गाँव तो मेरे दिल में बस्ता यारों
शहर में आकर ये गंवार मेरी शहरी जात पूछता रहा

मेरा रोना तो लाजिमी ही था इस दुर्घटना पर दोस्तों
रखकर मेरे हाथ में सूरज ,होगी बरसात पूछता रहा

अशोक पि गया अपमान का कड़वा घूंट फिर यारों
मेरी यादों को उघाड़कर कैसे कटी रात पूछता रह

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