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13 Feb 2017 · 1 min read

II ठहर गया हूं मैं II

हर कोई गुजर जाता है, हवा के झोंके की तरह l
दुनिया की दौड़ में शायद ,ठहर गया हूं मैं lI

आज मुझसे भी किसी ने ,उसका पता पूछाl
जिसकी तलाश में खुद ही, भटक गया हूं मैं lI

सजाता हूं करीने से ,घर की चीजो कोl
शायद अंदर से कहीं, बिखर गया हूं मैंlI

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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